अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता,
श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतिपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।
मार्कण्डेय उवाच।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १॥
दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ २॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ३॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ४॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ५॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ६॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ७॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ८॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ९॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १०॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ११॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १२॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १३॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १४॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १५॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १६॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १७॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १८॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १९॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २०॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २१॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २२॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २३॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २४॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २५॥
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २६॥
सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम् ॥ २७॥
