श्रीदेव्युवाच
भक्तवत्सल भैरव्या नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ 1 ॥
श्रीशिव उवाच
शृणु प्रिये महागोप्यं नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ 2 ॥
यस्यानुष्ठानमात्रेण किं न सिद्ध्यति भूतले ॥ 3 ॥
आर्या ब्राह्मी कामधेनुस्सर्वसम्पत्प्रदायिनी ॥ 4 ॥
मोहघ्नी मालती माला महापातकनाशिनी ॥ 5 ॥
त्रिपुरा त्रिपुराधारा त्रिनेत्रा भीमभैरवी ॥ 6 ॥
दामोदरप्रिया दीर्घा दुर्गा दुर्गतिनाशिनी ॥ 7 ॥
प्रत्यङ्गिरा प्रतिपदा प्रणतक्लेशनाशिनी ॥ 8 ॥
क्षीराब्धितनया क्षेम्या जगत्त्राणविधायिनी ॥ 9 ॥
महापातकसंहर्त्री महामोहप्रदायिनी ॥ 10 ॥
कपालखट्वाङ्गधरा खड्गखर्परधारिणी ॥ 11 ॥
कौमोदकी कुमुदिनी कीर्त्या कीर्तिप्रदायिनी ॥ 12 ॥
घर्घरा घर्घरारावा घोरा घोरस्वरूपिणी ॥ 13 ॥
किशोरी केशवप्रीता क्लेशसङ्घनिवारिणी ॥ 14 ॥
महायज्ञा महावाणी महामन्दरधारिणी ॥ 15 ॥
अट्टाट्टहासनिरता क्वणन्नूपुरधारिणी ॥ 16 ॥
दनुजान्तकरी दुष्टा दुःखदारिद्र्यभञ्जिनी ॥ 17 ॥
मनोभवा मनुमयी मनुवंशप्रवर्धिनी ॥ 18 ॥
इति ते कथितं दिव्यं नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ 19 ॥
अप्रकाश्यमिदं गोप्यं पठनीयं प्रयत्नतः ॥ 20 ॥
पूजयेत्सततं भक्त्या पठेत् स्तोत्रमिदं शुभम् ॥ 21 ॥
किमत्र बहुनोक्तेन त्वदग्रे प्राणवल्लभे ॥ 22 ॥
न देयं परशिष्येभ्यो निन्दकेभ्यो विशेषतः ॥ 23 ॥

