शुक्ल चतुर्दशी सोम दिन लियो नरसिंह अवतार ॥
तुमरे सुमरन से प्रभु , पूरन हो सब काम ॥
धन बल विद्या दान दे मोहि ॥1॥
करो सदा भक्तन प्रतिपाला ॥2 ॥
महाकाल कालन को काला ॥3 ॥
अल्प बुद्धि में ना कछु जानोम् ॥4॥
तेहि के भार मही अकुलानी ॥5॥
नाम भक्त प्रहलाद कहाये ॥6॥
पिता कियो मारन परसाया ॥7॥
अग्निदाह कियो प्रचण्डा ॥8॥
दुष्ट-दलन हरण महिभारा ॥9॥
प्रह्लाद के प्राण पियारे ॥10॥
देख दुष्ट-दल भये अचम्भा ॥11॥
ऊर्ध्व केश महादष्ट्र विराजा ॥12॥
को वरने तुम्हरों विस्तारा ॥13॥
नख जिह्वा है अति विकराला ॥14॥
कानन कुण्डल की छवि न्यारी ॥15॥
हिरणा कुश खल क्षण मह मारा ॥16॥
इन्द्र महेश सदा मन लावे ॥17॥
शेष शारदा पारन पावे ॥18॥
ताको होय सदा कल्याना ॥19॥
भव बन्धन प्रभु आप ही टारो ॥20॥
दुःख व्याधि हो निस्तारा ॥21॥
मन इच्छित सो नर सुत पावे ॥22॥
नर दरिद्र धनी होई जावे ॥23॥
ताहि विपत्ति सपनें नही आवे ॥24॥
सब निश्चय सो सिद्ध हुई जाही ॥25॥
निश्चय नरसिंह सुमरे सोई ॥26 ॥
ताकि काया कञ्चन होई ॥27॥
ग्रह-व्याधि अरु यम विकराला ॥28॥
यम के दूत निकट नहीं आवे ॥29॥
रोग-शोक कबहूं नही लागे ॥30॥
सो नरसिंह चालीसा गाई ॥31॥
बचन सत्य साखी भगवाना ॥32॥
सो नर मन वाञ्छित फल पावे ॥33॥
हो जावे वह नर जग मानी ॥34॥
सो नर रहे तुम्हारा प्यारा ॥35॥
दुःख दरिद्र ताके निकट न आवे ॥36॥
सो नर जग में सब कुछ पावे ॥37॥
पढ़ए रङ्क होवे अवनीसा ॥38॥
तोही विमुख बहु दुःख उठावे ॥39॥
हरो नाथ सब विपत्ति हमारी ॥40 ॥
निज भक्तनु के प्राण हित लियो जगत अवतार ॥
उस घर आनन्द रहे वैभव बढ़ए अपार ॥
