नारद उवाच-
सर्वाभीष्टप्रदं पुंसां सर्वपापप्रणाशनम् ॥ 1॥
मङ्गलं ग्रहपीडादिशान्तिदं वक्तुमर्हसि ॥ 2॥
शृणु नारद देवर्षे लोकानुग्रहकाम्यया ।
यत्पृच्छसि परं पुण्यं तत्ते वक्ष्यामि कौतुकात् ॥ 3॥
मेनायां ब्रह्मवादिन्यां प्रादुर्भूता हरप्रिया ॥ 4॥
स्वमेव वल्लभं भेजे कलेव हि कलानिधिम् ॥ 5॥
स्वसुतायाः परिक्षीणे वसिष्ठेन प्रबोधितः ॥ 6॥
प्रादुर्भूता सुतात्वेन तद्वियोगं शुभं त्यज ॥ 7॥
सनातनस्य जाया सा पुत्रीमोहं त्यजाधुना ॥ 8॥
तदा प्रसन्ना सा दुर्गा पितरं प्राह नन्दिनी ॥ 9॥
तेन नाम्नां सहस्रेण पूजयन् काममाप्नुहि ॥ 10॥
नाम्नां सहस्रं दुर्गायाः पृच्छते मे यदुक्तवान् ॥ 11॥
सर्वाभीष्टप्रदां पुंसां ब्रवीम्यखिलकामदम् ॥ 12॥
छन्दोनुष्टुप् जपो देव्याः प्रीतये क्रियते सदा ॥ 13॥
दुर्गाभगवती देवता । श्रीदुर्गाप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । ।
श्रीभगवत्यै दुर्गायै नमः ।
ॐ ह्रीं कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां
शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम् ।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं
ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः ॥
ॐ शिवाथोमा रमा शक्तिरनन्ता निष्कलाऽमला ।
शान्ता माहेश्वरी नित्या शाश्वता परमा क्षमा ॥ 1॥
अनादिरव्यया शुद्धा सर्वज्ञा सर्वगाऽचला ॥ 2॥
महामाहेश्वरी सत्या महादेवी निरञ्जना ॥ 3॥
सर्वा सर्वात्मिका विश्वा ज्योतीरूपाक्षरामृता ॥ 4॥
व्योममूर्तिर्व्योमसंस्था व्योमधाराऽच्युताऽतुला ॥ 5॥
ऋतुप्रथमजाऽनाभिरमृतात्मसमाश्रया ॥ 6॥
प्राणेश्वरी प्राणरूपा प्रधानपुरुषेश्वरी ॥ 7॥
सर्वकार्यनियन्त्री च सर्वभूतेश्वरेश्वरी ॥ 8॥
सनातनी महानन्दाऽऽकाशयोनिस्तथेच्यते ॥ 9॥
महामाया सदुष्पारा मूलप्रकृतिरीशिका ॥ 10॥
संसारपारा दुर्वारा दुर्निरीक्षा दुरासदा ॥ 11॥
महाविभूतिर्दुर्दर्शा मूलप्रकृतिसम्भवा ॥ 12॥
सर्गस्थित्यन्तकृच्चैव सुदुर्वाच्या दुरत्यया ॥ 13॥
प्रधानपुरुषातीता प्रधानपुरुषात्मिका ॥ 14॥
पूतान्तरस्था कूटस्था महापुरुषसञ्ज्ञिता ॥ 15॥
वाञ्छाप्रदाऽनवच्छिन्नप्रधानानुप्रवेशिनी ॥ 16॥
मलापवर्जिताऽऽनादिमाया त्रितयतत्त्विका ॥ 17॥
महामाया नगोत्पन्ना तामसी च ध्रुवा तथा ॥ 18॥
प्रोच्यते कार्यजननी नित्यप्रसवधर्मिणी ॥ 19॥
ब्रह्मगर्भा चतुर्विंशस्वरूपा पद्मवासिनी ॥ 20॥
महालक्ष्मी समुद्भावभावितात्मामहेश्वरी ॥ 21॥
सर्वार्थधारिणी सूक्ष्मा ह्यविद्धा परमार्थदा ॥ 22॥
अनेकानेकहस्ता च कालत्रयविवर्जिता ॥ 23॥
ब्रह्मेशविष्णुसम्पूज्या ब्रह्माख्या ब्रह्मसञ्ज्ञिता ॥ 24॥
ज्ञानस्वरूपा वैराग्यरूपा ह्यैश्वर्यरूपिणी ॥ 25॥
अपांयोनिः स्वयम्भूता मानसी तत्त्वसम्भवा ॥ 26॥
भवानी चैव रुद्राणी महालक्ष्मीस्तथाऽम्बिका ॥ 27॥
सर्वेश्वरी सर्ववन्द्या नित्यमुक्ता सुमानसा ॥ 28॥
ईश्वरार्धासनगता माहेश्वरपतिव्रता ॥ 29॥
परमानन्ददात्री च गुणाग्र्या योगदा तथा ॥ 30॥
अनन्तगुणगम्भीरा ह्युरोनीलमणिप्रभा ॥ 31॥
सरस्वती सर्वविद्या जगज्ज्येष्ठा सुमङ्गला ॥ 32॥
वागीश्वरी ब्रह्मविद्या महाविद्या सुशोभना ॥ 33॥
स्वाहा विश्वम्भरा सिद्धिः साध्या मेधा धृतिः कृतिः ॥ 34॥
पूजाविभाविनी सौम्या भोग्यभाग् भोगदायिनी ॥ 35॥
परमेष्ठिप्रिया चैव त्रिलोकीसुन्दरी माता ॥ 36॥
महामहिषदर्पघ्नी पद्ममालाऽघहारिणी ॥ 37॥
पिताम्बरधरा दिव्यविभूषण विभूषिता ॥ 38॥
निर्यन्त्रा यन्त्रवाहस्था नन्दिनी रुद्रकालिका ॥ 39॥
पद्मासनगता गौरी महाकाली सुरार्चिता ॥ 40॥
विरूपाक्षा केशिवाहा गुहापुरनिवासिनी ॥ 41॥
भास्वद्रूपा मुक्तिदात्री प्रणतक्लेशभञ्जना ॥ 42॥
बहुरूपा सुरूपा च विरूपा रूपवर्जिता ॥ 43॥
सर्वज्ञानपरीताङ्गी सर्वासुरविमर्दिका ॥ 44॥
दीक्षा विद्याधरी दीप्ता महेन्द्राहितपातिनी ॥ 45॥
अकलङ्का निराधारा नित्यसिद्धा निरामया ॥ 46॥
निःसङ्कल्पा निरातङ्का विनया विनयप्रदा ॥ 47॥
सुभगा सुविशुद्धा च वसुदेवसमुद्भवा ॥ 48॥
ज्ञानज्ञेया परातीता वेदान्तविषया मतिः ॥ 49॥
योगमाया विभागज्ञा महामोहा गरीयसी ॥ 50॥
बीजाङ्कुरसमुद्भूता महाशक्तिर्महामतिः ॥ 51॥
हीङ्कृतिः शङ्करी शान्तिर्गन्धर्वगणसेविता ॥ 52॥
महारात्री परानन्दा शची दुःस्वप्ननाशिनी ॥ 53॥
गुहाम्बिका गणोत्पन्ना महापीठा मरुत्सुता ॥ 54॥
जगन्माता जगन्मृत्युर्जरातीता च बुद्धिदा ॥ 55॥
दैत्यहन्त्री स्वेष्टदात्री मङ्गलैकसुविग्रहा ॥ 56॥
दिविस्थिता त्रिणेत्रा च सर्वेन्द्रियमनाधृतिः ॥ 57॥
वेद्या ब्रह्मविवेद्या च महालीला प्रकीर्तिता ॥ 58॥
हिरण्मयी महादात्री संसारपरिवर्तिका ॥ 59॥
उन्मूलिनी सर्वसभा सर्वप्रत्ययसाक्षिणी ॥ 60॥
सत्त्वशुद्धिकरी शुद्धा मलत्रयविनाशिनी ॥ 61॥
विमानस्था विशोका च शोकनाशिन्यनाहता ॥ 62॥
सदाकीर्तिः सर्वभूतशया देवी सताम्प्रिया ॥ 63॥
व्योमकेशा क्रियाशक्तिरिच्छाशक्तिः परागतिः ॥ 64॥
अभिन्ना भिन्नसंस्थाना वशिनी वंशधारिणी ॥ 65॥
भगिनी च निराधारा निराहारा प्रकीर्तिता ॥ 66॥
स्रग्विणी पद्मसम्भेदकारिणी परिकीर्तिता ॥ 67॥
परावरज्ञा विद्या च विद्युज्जिह्वा जिताश्रया ॥ 68॥
सहस्ररश्मिःसत्वस्था महेश्वरपदाश्रया ॥ 69॥
महाश्रया महामन्त्रा महादेवमनोरमा ॥ 70॥
विश्वेश्वरी भगवती सकला कालहारिणी ॥ 71॥
प्रलया योगधात्री च गङ्गा विश्वेश्वरी तथा ॥ 72॥
पुण्यदा कालकेशा च भोक्त्त्री पुष्करिणी तथा ॥ 73॥
पञ्चब्रह्मसमुत्पन्ना परमार्थाऽर्थविग्रहा ॥ 74॥
मनोहरा महोरस्का तामसी वेदरूपिणी ॥ 75॥
योगेश्वरेश्वरी माया महाशक्तिर्महामयी ॥ 76॥
सुरभिर्नन्दिनी विद्या नन्दगोपतनूद्भवा ॥ 77॥
सर्वप्रहरणोपेता काम्या कामेश्वरेश्वरी ॥ 78॥
कूष्माण्डा धनरत्नाढ्या सुगन्धा गन्धदायिनी ॥ 79॥
सुदुर्लभा धनाध्यक्षा धन्या पिङ्गललोचना ॥ 80॥
इन्द्राक्षी हृदयान्तःस्था शिवा माता च सत्क्रिया ॥ 81॥
दुर्गा कात्यायनी चण्डी चन्द्रिका कान्तविग्रहा ॥ 82॥
मन्दराद्रिनिवासा च शारदा स्वर्णमालिनी ॥ 83॥
पद्मानन्दा पद्मनिभा नित्यपुष्टा कृतोद्भवा ॥ 84॥
महेन्द्रभगिनी सत्या सत्यभाषा सुकोमला ॥ 85॥
वाच्यवर्णेश्वरी विद्या दुर्जया दुरतिक्रमा ॥ 86॥
भद्रकाली जगन्माता भक्तानां भद्रदायिनी ॥ 87॥
यशस्विनी यशोदा च षडध्वपरिवर्तिका ॥ 88॥
चैत्रादिर्वत्सरारूढा जगत्सम्पूरणीन्द्रजा ॥ 89॥
खगारूढा महैश्वर्या सुपद्मनिलया तथा ॥ 90॥
शुम्भादिमथना भक्तहृद्गह्वरनिवासिनी ॥ 91॥
सर्वविज्ञानदात्री चानल्पकल्मषहारिणी ॥ 92॥
सद्वृता लोकसंव्याप्ता तुष्टिः पुष्टिः क्रियावती ॥ 93॥
शिवाधृता लोहिताक्षी सर्पमालाविभूषणा ॥ 94॥
अशेषध्येयमूर्तिश्च देवतानां च देवता ॥ 95॥
सुवर्णा स्वर्णलसिताऽनन्तवर्णा सदाधृता ॥ 96॥
विश्वगोप्त्री गूढरूपा गुणपूर्णा च गार्ग्यजा ॥ 97॥
सर्वपापविनिर्मुक्ता सर्वबन्धविवर्जिता ॥ 98॥
विशुद्धसुकुलोद्भूता बिन्दुनादसमादृता ॥ 99॥
वनमालाविराजन्ती अनन्तशयनादृता ॥ 100॥
दैत्यप्रमाथिनी शङ्खचक्रपद्मगदाधरा ॥ 101॥
सुवृता सुन्दरी चैव धर्मकामार्थदायिनी ॥ 102॥
महाविभूतिदाऽऽराध्या सरोजनिलयाऽसमा ॥ 103॥
सर्वशक्तिसमारूढा धर्माधर्मविवर्जिता ॥ 104॥
विचित्रगहनाधारा शाश्वतस्थानवासिनी ॥ 105॥
मनस्विनी मन्युमाता महामन्युसमुद्भवा ॥ 106॥
अशोच्या भिन्नविषया हिरण्यरजतप्रिया ॥ 107॥
विभ्राजमाना दुर्ज्ञेया ज्योतिष्टोमफलप्रदा ॥ 108॥
दीर्घा ककुद्मिनी पिङ्गजटाधारा मनोज्ञधीः ॥ 109॥
त्रितत्त्वमाता त्रिविधा सुसूक्ष्मा पद्मसंश्रया ॥ 110॥
चित्रमाया शिवज्ञानस्वरूपा दैत्यमाथिनी ॥ 111॥
त्रयीमूर्तिः क्रियामूर्तिश्चतुर्वर्गा च दर्शिनी ॥ 112॥
कौशिकी ललिता लीला परावरविभाविनी ॥ 113॥
सुभद्रा चेतनाराध्या शान्तिदा शान्तिवर्धिनी ॥ 114॥
त्रिशक्तिजननी जन्या षट्सूत्रपरिवर्णिता ॥ 115॥
सङ्कर्षिणी जगद्धात्री कामयोनिः किरीटिनी ॥ 116॥
प्रद्युम्नजननी बिम्बसमोष्ठी पद्मलोचना ॥ 117॥
वृषाधीशा परात्मा च विन्ध्या पर्वतवासिनी ॥ 118॥
चाणूरहन्त्री नीतिज्ञा कामरूपा त्रयीतनुः ॥ 119॥
वीरभद्रादृता वीरा महाकालसमुद्भवा ॥ 120॥
श्रद्धात्मिका पावनी च मोहिनी अचलात्मिका ॥ 121॥
मनीषिणी सुधावाणी वीणावादनतत्परा ॥ 122॥
हिरण्याक्षी तथा चैव महानन्दप्रदायिनी ॥ 123॥
परावरा वरारोहा सहस्रनयनार्चिता ॥ 124॥
श्रीप्रदा श्रितकल्याणा श्रीधरार्धशरीरिणी ॥ 125॥
रक्तबीजनिहन्त्री च दैत्यसङ्गविमर्दिनी ॥ 126॥
सुकीर्तिसहिताच्छिन्नसंशया रसवेदिनी ॥ 127॥
नित्योदिता स्वयञ्ज्योतिः स्वर्णकाया प्रकीर्तिता ॥ 128॥
वज्रच्छन्ना देवदेवी वरवज्रस्वविग्रहा ॥ 129॥
गन्धर्वी तरुणी चान्द्री खड्गायुधधरा तथा ॥ 130॥
एकानङ्गा च शास्त्रार्थकुशला धर्मचारिणी ॥ 131॥
धर्मशक्तिर्धर्ममया धार्मिकानां शिवप्रदा ॥ 132॥
धर्मवर्ष्मा धर्मपूर्वा धर्मपारङ्गतान्तरा ॥ 133॥
कपालिनी शाकलिनी कलाकलितविग्रहा ॥ 134॥
कंसप्राणहरा चैव युगधर्मधरा तथा ॥ 135॥
स्वर्गापवर्गदात्री च तथा प्रत्यक्षदेवता ॥ 136॥
पद्मासनगता प्रोक्ता खड्गबाणशरासना ॥ 137॥
शतरूपा शतावर्ता वितता रासमोदिनी ॥ 138॥
सूर्यान्तरस्थिता चैव सत्प्रतिष्ठतविग्रहा ॥ 139॥
कात्यायनी चण्डिका च चण्डी हैमवती तथा ॥ 140॥
धूम्रलोचनहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥ 141॥
देवप्रियङ्करी शुद्धा भक्तभक्तिप्रवर्धिनी ॥ 142॥
अर्जुनाभीष्टदात्री च पाण्डवप्रियकारिणी ॥ 143॥
विघ्नेशजननी भक्तविघ्नस्तोमप्रहारिणी ॥ 144॥
अनादिनिधना प्रेष्ठा चित्रमाल्यानुलेपना ॥ 145॥
कृत्याप्रहारिणी चैव मारणोच्चाटनी तथा ॥ 146॥
षड्वैरिनिग्रहकरी वैरिविद्राविणी तथा ॥ 147॥
नारदस्तुतचारित्रा वरदेशा वरप्रदा ॥ 148॥
दिक्पालसेविता भव्या भामिनी भावदायिनी ॥ 149॥
व्योमगा भूमिगा चैव मुनिपूज्यपदाम्बुजा ।
वनदुर्गा च दुर्बोधा महादुर्गा प्रकीर्तिता ॥ 150॥
इतीदं कीर्तिदं भद्र दुर्गानामसहस्रकम् ।
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं तस्य लक्ष्मीः स्थिरा भवेत् ॥ 1॥
बालग्रहादिपीडायाः शान्तिर्भवति कीर्तनात् ॥ 2॥
व्यवहारे च जयदं शत्रुबाधानिवारकम् ॥ 3॥
आयुरारोग्यदं पुंसां सर्वसम्पत्प्रदायकम् ॥ 4॥
शुभदं शुभकार्येषु पठतां शृणुतामपि ॥ 5॥
पुष्पैः कुङ्कुमसम्मिश्रैः स तु यत्काङ्क्षते हृदि ॥ 6॥
यन्मुखे ध्रियते नित्यं दुर्गानामसहस्रकम् ॥ 7॥
दुर्गानामसहस्रस्य पुस्तकं यद्गृहे भवेत् ॥ 8॥
तद्गृहं पुण्यदं क्षेत्रं देवीसान्निध्यकारकम् ॥ 9॥
देवतायाः प्रसादेन सर्वपूज्यः सुखी भवेत् ॥ 10॥
गुह्याद्गुह्यतरं स्तोत्रं त्वयि स्नेहात् प्रकीर्तितम् ॥ 11॥
हृदि धारय नित्यं त्वं देव्यनुग्रहसाधकम् ॥ 12॥
