अम्बाश्चरूपिणं शान्तं नितान्तं योगिनी प्रियम् ॥ १॥
कलौसिद्धि क्षणार्धेन कथं भवति तद्वदः ॥ २॥
साधकानां कथं सिद्धि चतुर्वर्गार्थसाधनम् ॥ ३॥
वाञ्छासिद्धि कल्पनिकी मनोरथमयी परः ॥ ४॥
कथं भवति विश्वेश तन्मेवद शिवप्रभो ॥ ५॥
भक्तप्राण प्रिये साध्वी ममहं जिवनौषधि ॥ ६॥
एतावत्काल पर्यन्तं गोपितं सर्व जन्तुषु ॥ ७॥
त्वं च गोपयसिप्राज्ञेततेतर्हि वदाम्यहम् ॥ ८॥
भूतशुद्धिविना द्रव्यंहोमशुद्धिविना प्रिये ॥ १०॥
महानिलगिरौपूर्वं महाचोलहृदस्थिताः ॥ ११॥
तत्कुण्डे श्रीमहातारा विधाराती प्रतिष्ठिताः ॥ १२॥
दृष्ट्वा तारामहाविद्या स्वमेवाव शरन्ददौ ॥ १३॥
कोटिवक्त्र विरञ्चाद्या महेन्द्राणां मनन्तकम् ॥ १४॥
समस्तां स्तांश्च संविक्ष्य महोग्रादर्शनं ददौः ॥ १५॥
अल्पालीठ पदातारा बटुकादैकणैर्युताः ॥ १६॥
शब्दोजाते कहत्येव सर्वाश्चर्य करःपर ॥ १७॥
हकारा शिवरूपत्वं तधादिमतमीरितम् ॥ १८॥
द्वयं मिलीत्वाद्वेवेश कहत्येवं मनुर्भवेत् ॥ १९॥
उत्तरोर्ध्वाम्नापराज्ञा कहत्येवं महामनुः ॥ २०॥
शाम्भवं च तथा मेधा कदावपितथाद्भूतम् ॥ २१॥
वासिवृका तपाचार्धे पूर्वाचात्र प्रयोजता ॥ २२॥
चन्द्राग्निदेवपञ्चार्णा तयानीलाक्रमेणी च ॥ २३॥
त्रयोक्ता दिव्यसाम्राज्यमेधा दीक्षाक्रमेभवेत् ॥ २४॥
पतद्युक्तः कहत्यवंसद्वस्तत्र वभूव च ॥ २५॥
कृत्वाक्षोश्वमुखादुक्तं कटाक्षोत्प्रेक्षणेन च ॥ २६॥
वायुनातन्मुखोत्घात स्पर्शेनापि महेश्वरी ॥ २७॥
कोटिवक्त्र विरञाद्या स्व स्वस्थाना निलेभिरे ॥ २८॥
सकामनिरतासर्वे स्व स्वसिद्धि परायणा ॥ २९॥
दिव्यसाम्राज्यनामाख्यं नामसाहस्रमुत्तमम् ॥ ३०॥
प्रसिदति तदातेन सदा तारा प्रसिदति ॥ ३१॥
मज्जाभिश्च तथा रक्तैस्तर्पयेत्प्रपठेत्सदा ॥ ३२॥
दिव्यसाम्राज्यमेधाख्यं नाम साहस्रकस्य च ॥ ३३॥
ऊग्रतारा देवतास्या कूर्चबीजं प्रकीर्तितम् ॥ ३४॥
तारा बीजं तथा काल्या शक्ति छिन्नामनुर्भवेत् ॥ ३५॥
अस्त्र शक्तिश्च भुवना कीलकं नचाङ्गुयक् ॥ ३६॥
ध्यानं मन्त्रवदासाद्य नामसाहस्रकं पठेत् ॥ ३७॥
सहस्रकस्य अक्षोभ्यऋषिः बृहति छन्दः ।
उग्रतारादित्रिशक्ति देवता हं बीजं फट् शक्तिः
हं कीलकं श्रीमहोग्रतारा प्रत्यक्ष दर्शनाद्यर्थे विनियोगः ॥ ३८॥
महोग्रतारा स्त्रीतारा त्रिकटैकजटाधरा ॥ ३९॥
ताण्डवाह्लाद निरत तहणी तहणाकृतिः ॥ ४०॥
तारूण्यातकल्लोला तारूण्यामृतकन्यका ॥ ४१॥
तीर्थसेवापरातुष्टा त्रां त्रीं त्रूं त्रैं स्वरूपिणी ॥ ४२॥
तनिम्रालालवृक्षस्था तालीपान परायणा ॥ ४३॥
तरुणीकुसुमाह्लादा तरुणीबीजरूपिणी ॥ ४४॥
तरुणीपूजनिरता तरुणीभक्ततत्परा ॥ ४५॥
ताररूपा ताम्रपर्णी ताम्रपत्रसमस्थिता ॥ ४६॥
तरुणीताडिकान्नाथा तरुणीमुखगोचरा ॥ ४७॥
तरुणीवाक्यमध्या च तरुणीताण्डवर्णवा ॥ ४८॥
तरुणीमुक्तीमाला च तरुणीभक्तरूपिणी ॥ ४९॥
तरुणीनामिकानन्ता तरुणीरत्नरूपिणी ॥ ५०॥
तरुणीचुम्बनरता तरुणीलिङ्गरूपिणी ॥ ५१॥
तनाननास्वरूपा च तथैरूपप्रधारिणी ॥ ५२॥
तृसिदा तृणरूपा च तार्तीयगुणभूषिता ॥ ५३॥
तत्त्वज्ञाना तत्त्वबुद्धि तत्त्वनाथा तथामति ॥ ५४॥
तमातरमध्यस्वरूपा च तरदन्नर तामति ॥ ५५॥
त्रिकाल्यदा च त्रैर्पक्षताराणापकभूषणा ॥ ५६॥
ताराक्षहारिणी तीर्णा तारूण्यकुण्डभोगिनी ॥ ५७॥
थैथैरूपा थरिग्रूपा थौङ्गदादिकरूपिणी ॥ ५८॥
थेथकुटाक्शरौप्यां थीन्थूङ्काराक्षरमालिनि ॥ ५९॥
दक्षपुत्री दक्षयज्ञनाशिनी दानवी दया ॥ ६०॥
दयालु दैत्यशमनी द्रव्यहाद्रव्यवत्साली ॥ ६१॥
दयार्ता दीपिनी दिशा दीपमार्गपरायणा ॥ ६२॥
दुःखसंहारिणी दुष्टदैत्यविध्वंसनक्षमा ॥ ६३॥
दाडीमिवाजदत्ता च दाडीरूपा दरस्थिता ॥ ६४॥
दुर्गा दुर्गविहंत्रि च दुःखप्रणाशिनी दरी ॥ ६५॥
दानदक्षा दानपूजा दानतुष्टा दयातति ॥ ६६॥
दासीबीजरता दाना दीनारदायिनी द्रुती ॥ ६७॥
दासीचुम्बनसन्तुष्टा दासीमथनतत्परा ॥ ६८॥
दूं बीजजपसन्तुष्टा दूंवुस्वाहा स्वरूपिणी ॥ ६९॥
धूं बीजनिलया धूम्रा धूधून्धूमावति धृति ॥ ७०॥
धर्मिष्ठा धर्मनिरता धर्ममार्गपरायणा ॥ ७१॥
धिमिथरिहवरूपा च धर्मतारा धनार्चिता ॥ ७२॥
धात्रीप्रसुनसन्तुष्टा धात्रीफलकुचद्वया ॥ ७३॥
ध्यानदात्री ध्यानगात्रा ध्यानस्था ध्यानरूपिणी ॥ ७४॥
ध्यानपरायणप्रीता ध्यानध्येयस्वरूपिणी ॥ ७५॥
धिकतान्धिस्वरूपा च धैधैशब्दपरायणा ॥ ७६॥
धर्मग्रामरताङ्घ्रिं च ध्रीन्ध्रीन्धून्धौं स्वरूपिणी ॥ ७७॥
नारसिंही नतिर्नारी नरपुष्पस्वरूपिणी ॥ ७८॥
नरपुष्पार्चनपुष्पा नरपुष्पक्रियामति ॥ ७९॥
नरयज्ञा नरानन्दा नरयज्ञपरायणा ॥ ८०॥
नानामाना ननननास्वरूपा नाप्रर्विता ॥ ८१॥
नानाभाषाप्ररूढा च नानावर्णश्चरूपिणी ॥ ८२॥
नगज्वानगसम्भूता नगवंश प्रतोषिता ॥ ८३॥
नारदप्रियसन्तुष्टा नारदप्रियमानसा ॥ ८४॥
निम्ननाभी निश्चयोनि निम्ननेत्रा नरोत्तमा ॥ ८५॥
नान्नीन्नून्नैन्नौं स्वरूपा च नमोरूपा नमोनमः ॥ ८६॥
नित्यपूजार्चनप्रीता नित्यपूजापरायणा ॥ ८७॥
नर्मदा नर्मरूपा च नर्मकुण्डवीकानी ॥ ८८॥
नैमित्तिकार्चनप्रीता नैमित्तिकपरायणा ॥ ८९॥
नीवीमोचनसन्तुष्टा नीवीमोचनतत्परा ॥ ९०॥
नारीपुष्पमतीप्रीता नारीपुष्पस्वरूपिणी ॥ ९१॥
नाडीनादपरानन्दा नाडीनादपरागती ॥ ९२॥
पद्मपूजनसन्तुष्टा पद्महोमपरायणा ॥ ९३॥
परातीता परागम्या परमात्मा परागति ॥ ९४॥
प्राणवा प्राणवेज्या च परतत्वा परायणा ॥ ९५॥
पापसंहारिणी तुष्टा पुण्यदात्री परातरी ॥ ९६॥
पुराणगम्या पानाट्या पानतोषणतत्परा ॥ ९७॥
पीनयोनी पीतजङ्घा पीताम्बरधरावति ॥ ९८॥
पीतपुष्पाञ्जलिरता पीतद्रदनिवासिनी ॥ ९९॥
परदारप्रिया पत्राधरधार प्रहर्षिणी ॥ १००॥
परदारप्रियापात्रा पात्रतोषणतत्परा ॥ १०१॥
पात्रपुष्पप्रिया पात्रकुण्डानन्दपरेश्वरी ॥ १०२॥
पवित्रा पुण्यचारित्रा पवित्रारोपणात्मिका ॥ १०३॥
पात्रगीत पात्रनपा पात्रसंयोगरूपिणी ॥ १०४॥
पात्रकुण्डध्वनिरता पात्रकुण्डध्वनिप्रिया ॥ १०५॥
परस्वनाशिनीप्रीता पार्वती पर्वतात्मजा ॥ १०६॥
परायणा पारची च पतिधर्मविधारिणी ॥ १०७॥
पतिव्रतधरा पीनवक्षोजद्वयधारिणी ॥ १०८॥
प्रेतगर्भा प्रेतरूपा प्रेतभूषणभूषणी ॥ १०९॥
प्रेतशी प्रेतराज्ञी च प्रेतव्रतपरायणा ॥ ११०॥
पार्थिवा पार्थवेज्या च पृथुला पृथुरूपिणी ॥ १११॥
पापान् विनाशिनी पद्या गद्यपद्यपरायणा ॥ ११२॥
पाम्पीङ्काररता प्राणा प्राणदात्री प्रतापिनी ॥ ११३॥
प्रज्ञा प्रज्ञावतीप्रज्ञा प्रज्ञानप्रतिभावती ॥ ११४॥
प्रजापति प्रियापारा पुरीन्द्रध्वजशोभिता ॥ ११५॥
फुम्फुङ्कारा च फट्कारा फट्काररूपधारिणी ॥ ११६॥
फ्रोङ्काराफेरवी फ्राम्फ्रूम्फेत्कारी फणधारिणी ॥ ११७॥
फणिभूषणसम्भूषा फणिनाथप्रियार्चिता ॥ ११८॥
पशुहस्ता पशुमति परशुरामप्रसादिनी ॥ ११९॥
फ्रेत्कारा फाल्गुनानन्दा फली फुल्लप्रिया फुला ॥ १२०॥
फलहोमप्रियस्फाला फलनामपरायणा ॥ १२१॥
बृहत्सेवा बृहत्ब्रह्मी ब्रह्मीब्रह्मप्रपूजिता ॥ १२२॥
बाणासुरार्चिता ब्रूं च ब्राम्ब्रीम्ब्रैम्ब्रौं स्वरूपिणी ॥ १२३॥
बटुका बटुकेज्या च बटुकप्राणमानसा ॥ १२४॥
बटुकार्चनसन्तुष्टा बलीदानप्रियाबली ॥ १२५॥
बलिद्वारस्थिता बाला बालां वा बालभैरवी ॥ १२६॥
बलितुष्टा बलिरता बलितोषणकारिणी ॥ १२७॥
बला बलार्चनप्रीता बलधारणतत्परा ॥ १२८॥
बटुकाराधनप्रीता बटुकार्यवतारिणी ॥ १२९॥
बृहत्कुक्षि बृहत्तारा बृहत्तन्त्रागमेश्वरी ॥ १३०॥
बृहन्माता बृहज्वाला बृहन्मानमयीबृहत् ॥ १३१॥
बृहदारण्यसंसेव्या बालचन्द्रकिरीटिनी ॥ १३२॥
बाहुला बाहुलेयेसी बाहुलेयस्वरूपिणी ॥ १३३॥
बुद्धि बुद्धिमता बौद्धा बौद्धाचारपरायणा ॥ १३४॥
बृहस्पतिसुताराध्या बुद्धिमाता बुधेश्वरी ॥ १३५॥
भानुमत्ता भानुमयी भानुभार्या भवेश्वरी ॥ १३६॥
भवमाता भवरताश्रवतारणतारिणी ॥ १३७॥
भर्तनीतिकरी भार्या भर्तदा भीमभीषणी ॥ १३८॥
भीमसेनप्रिया भीमा भीमाक्षी भीमभीतिदा ॥ १३९॥
भवदावानलघ्नी च भक्तपूज्या भवार्तिहा ॥ १४०॥
भृगरूपा भृगोपत्नी भृगुताण्डवकारिणी ॥ १४१॥
भारती भानवेश्या च भाषा भीमामयी भवा ॥ १४२॥
भ्राम्भ्रीम्भ्रूम्भ्रैं स्वरूपिणी भ्रमतीवविनाशिनी ॥ १४३॥
भ्रातृजाया भगवती भवानी भक्तवत्सला ॥ १४४॥
भ्रान्ता भ्रमरिका भीति भ्राजिश्णु भक्तरूपिणी ॥ १४५॥
भ्रामरी भ्रान्तमाला च भवेज्या भवसिद्धिदा ॥ १४६॥
भङ्काररूपिणी भ्रामा भगमालाविभूषणा ॥ १४७॥
भगलिङ्गामृतान्दोला भगाविलोलुपा ॥ १४८॥
भगतत्वा भगाव्हा च भगलिङ्गध्वनी भगा ॥ १४९॥
भगकुण्डाह्लादरता भगकुण्डविकासिनी ॥ १५०॥
भूपेज्या भूपसन्तुष्टा भैक्ष्यचर्वणतत्परा ॥ १५१॥
भगतन्त्रा भगामोहा भगगन्धपरायणा ॥ १५२॥
भगदर्शनसन्तुष्टा भगचुम्बनतोषिणी ॥ १५३॥
भूतेशी भूतदुर्गस्था भूपतित्वप्रदायिनी ॥ १५४॥
भहभहारकामहा भाष्यकर्ता भयापहा ॥ १५५॥
भरताप्रेमसन्तुष्टा भरताधाररूपिणी ॥ १५६॥
मामीपानन्दना माया मद्यपानपरायणा ॥ १५७॥
मदिरा मदिरोन्मत्ता माननीया मदोद्धता ॥ १५८॥
निमाता मालिनी मात्रा मदनीमृतदर्पिका ॥ १५९॥
म्राम्म्रीम्म्रूम्रैं स्वरूपा च म्रौम्म्रः सर्वस्वरूपिणी ॥ १६०॥
मलिना मलिनी मैत्रा मैत्रवारूणतारुणी ॥ १६१॥
महीधरसक्ता मात्रा मात्रास्वरविभेदिनी ॥ १६२॥
मधुपानरता मारी महामारी महीपति ॥ १६३॥
माहेशी च मदस्था च मदनस्थानरूपिणी ॥ १६४॥
महामदनसन्तुष्टा महामदनभूषिता ॥ १६५॥
मकाररूपिणी मुद्रा मुद्रामोदपरायणा ॥ १६६॥
महता मोजसाकारा महतानन्ददायिनी ॥ १६७॥
मेहपुत्री च मीनाक्षी मितभाषा मितार्थवित् ॥ १६८॥
महोरगा महोशुषा महती महिषापहा ॥ १६९॥
मुण्डप्राकारसंरूपा मुण्डासुरविमर्दिनी ॥ १७०॥
मुद्रिणी मन्त्रिणी मन्त्रा महामन्त्रा महार्णवा ॥ १७१॥
मनुर्मनुमयी माद्री मद्रकुञ्जरवासिनी ॥ १७२॥
मुक्ताहारविभूषाढ्या मुक्तकेशी महूर्तदा ॥ १७३॥
मन्त्रप्राणार्पणप्रीता मन्त्रप्राणार्पणार्चिता ॥ १७४॥
मकारवर्णसर्वाङ्गी मितभोगा मितान्मिता ॥ १७५॥
मुक्तारजन्तनासा च मुक्ताछत्रविभूषणा ॥ १७६॥
मितीर्मीतीमती मीनकेतु मकररूपिणी ॥ १७७॥
महोत्सवादुर्गा माया महापूजारमेत्यदा ॥ १७८॥
मद्यमांसवृतरता माघस्नानपरायणा ॥ १७९॥
मार्गमार्गामात्रका च मातृकालिपिरूपिणी ॥ १८०॥
मालिनीन्याससन्तुष्टा मालिनीमोक्षदायिनी ॥ १८१॥
मुक्ता मुक्तिप्रियकरी मुक्तिस्था मुक्तिताण्डवा ॥ १८२॥
महेन्द्रपूज्या माहेशी मतिसागरदायिनी ॥ १८३॥
यादेवी यादवाराध्या यदुवंशसमुद्भवा ॥ १८४॥
यामिनी यमपूज्या च यममातापतिप्रिया ॥ १८५॥
यशकर्पूरधवला योगिनी च यशस्विनी ॥ १८६॥
योगमाता योगगम्या योगमार्गपरायणा ॥ १८७॥
यथोक्ताचारनिरता यथोक्तफलदायिनी ॥ १८८॥
रमणी रमणीप्रीता रमा रत्नेश्वरी रती ॥ १८९॥
रत्नगर्भा रत्नबीजा राजीवलोचना रमा ॥ १९०॥
रौंरः वर्णस्वरूपा च राज्यदातृ रसातुला ॥ १९१॥
रतिरूपा रतान्ता च रतिगर्भपरायणा ॥ १९२॥
राजराजेश्वरीद्रष्टा रौद्री रूद्रप्रिया च हट् ॥ १९३॥
हद्रेज्या च त्रिरूपा च रात्रिञ्चरविभेदिनी ॥ १९४॥
हचिरा हचिरूपा च रोचिषा रोमरूपिणी ॥ १९५॥
रसा रसवती राज्यलक्ष्मी रावणनाशिनी ॥ १९६॥
रजोवती रजःप्राणा रजोगुणमयी रवा ॥ १९७॥
रैं बीजनिलया रैण्णा रेणुरूपा च हाकिनी ॥ १९८॥
रौप्यपरा रौप्यरौप्या रौप्यगेहविभूषणा ॥ १९९॥
महोग्रानामसाहस्रं तारण्या गदितं पुरा ॥ २०१॥
इदमेवपुरादेवी कालेनापि प्रकीर्तितम् ॥ २०२॥
तवर्गान्तुरकारान्तं तेनतारामयं शिवे ॥ २०३॥
पूजाकाले विशेषेण सन्ध्यायोभययोरपि ॥ २०४॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः ॥ २०५॥
कुलका स्मरणं तारा ध्यानं नामप्रकीर्तितम् ॥ २०६॥
सर्व सङ्कट विनिर्मुक्त सर्व सत्व समन्वितः ॥ २०७॥
यः पठेद्वापाठयेद्वापि शृणोतिश्रावयैदपि ॥ २०८॥
सर्वशास्त्रार्थवेत्ता च महाश्रुत्यधर कविः ॥ २०९॥
राजमञ्चे नदीकुले शय्यायामेकलिङ्गके ॥ २१०॥
प्रान्तरे पर्वते घोरे योनौऋतु पतिगृहे ॥ २११॥
यः स्मरेत्परया भक्त्या ताराभक्तिपरायणा ॥ २१२॥
सिन्दूरतिलकोन्नित्यं रक्तचन्दन त्रिपुण्ड्रधृत् ॥ २१३॥
खड्गस्तम्भं जगत्स्तम्भं सैन्यस्तम्भं विवस्वत ॥ २१४॥
प्रजपेत् परमेशानि सर्वैश्वर्यमयो भवेत् ॥ २१५॥
भगं विकसितं कृत्वा जपेत् सिद्धिश्वरो भवेत् ॥ २१६॥
मेष माहिष मार्जार शूकरा सर्व मुख्यकैः ॥ २१७॥
तारायादर्शनं प्राप्य त्रैलोक्ये विजयी भवेत् ॥ २१८॥
प्रजपेद्यत्नतो देवि सुरेन्द्रसदृशो भवेत् ॥ २१९॥
मन्त्रमादौजपे देवि मध्ये नाम सहस्रकम् ॥ २२०॥
मासमात्र प्रयोगेण सर्व कार्यक्षमो भवेत् ॥ २२१॥
स्वयम्भुः कुसुमैः शुक्रैः जपापावकसंयुतैः ॥ २२२॥
अनन्यभुक्त स्थिरधी मुक्तकेशो दिगम्बरः ॥ २२३॥
शिवस्थो वा श्मशानस्थ शून्यालय गतो शिवा ॥ २२४॥
जप्त्वा तारा महामन्त्रं पठेन्नामसहस्रकम् ॥ २२५॥
स भवेत्तारिणीं पुत्र इति ख्याति भवेच्छिवे ॥ २२६॥
