Goddess Bala Tripurasundari

रक्षा प्रार्थना

(Sri Bala Raksha Stotram)

Also known as bala raksha stotram · bala tripurasundari raksha prarthana · sarvalokaika janani

Eighteen verses of plain asking, and the least ornamented Bala text in this group — no viniyoga, no seed syllables, no concealment clause, only a person in trouble addressing the mother of the worlds. Guard me always from petty snares and from sins, says the first, calling her the one mother of every world and the giver of every wished-for fruit. The second piles the same word four times over — you who are the good of the world, the eye of the world, the mother of the world, who are made of the world — and asks to be guarded from the world's own net of misfortunes. The last verse drops even the asking and simply describes the person doing it: fallen into the sea of becoming, frightened, without protector, poor in mind; lift him and set him at your lotus feet.

Read In:

Script: Devanagari (देवनागरी) — also the script of Hindi, Marathi, Nepali and Konkani.

॥ श्री बाला रक्षा स्तोत्रम् ॥

॥ क्षुद्रजाल-पातक रक्षा ॥

सर्वलोकैकजननी सर्वाभीष्टफलप्रदे ।
रक्ष मां क्षुद्रजालेभ्यः पातकेभ्यश्च सर्वदा ॥ १ ॥

॥ जगद्दुरित निवारण ॥

जगद्धिते जगन्नेत्रि जगन्मातर्जगन्मये ।
जगद्दुरितजालेभ्यो रक्ष मामहितं हर ॥ २ ॥

॥ जन्मशत पाप नाश ॥

वाङ्मनः कायकरणैर्जन्मान्तरशतार्जितम् ।
पापं नाशय देवेशि पाहि मां कृपयाऽनिशम् ॥ ३ ॥

॥ जन्मसहस्र दुष्कृत निवारण ॥

जन्मान्तरसहस्रेषु यत्कृतं दुष्कृतं मया ।
तन्निवारय मां पाहि शरण्ये भक्तवत्सले ॥ ४ ॥

॥ स्व-पर कृत पाप नाश ॥

मया कृतान्यशेषाणि मदीयैश्च कृतानि च ।
पापानि नाशयस्वाद्य पाहि मां परदेवते ॥ ५ ॥

॥ ज्ञान-अज्ञान कृत पाप ॥

ज्ञानाज्ञानकृतैः पापैः साम्प्राप्तं दुरितं क्षणात् ।
निवारय जगन्मातरखिलैरनिवारितम् ॥ ६ ॥

॥ सत्कार्य प्रवर्तन ॥

असत्कार्य निवृत्तिं च सत्कार्यस्य प्रवर्तनम् ।
देवतात्मानुसन्धानं देहि मे परमेश्वरि ॥ ७ ॥

॥ देशिक स्मृति ॥

सर्वावरणविद्यानां सन्धानेनानुचिन्तनम् ।
देशिकाङ्घ्रिस्मृतिं चैव देहि मे जगदीश्वरि ॥ ८ ॥

॥ निश्चल चित्त ॥

अनुस्यूतपरब्रह्मानन्दामृतनिषेवणम् ।
अत्यन्तनिश्चलं चित्तं देहि मे परमेश्वरि ॥ ९ ॥

॥ सदाशिवोपासित पद ॥

सदाशिवाद्यैर्धात्र्यन्तैः देवताभिर्मुनीश्वरैः ।
उपासितं पदं यत्तद्देहि मे परमेश्वरि ॥ १० ॥

॥ विघ्न निवारण ॥

इन्द्रादिभिरशेषैश्च देवैरसुरराक्षसैः ।
कृतं विघ्नं निवार्याशु कृपया रक्ष रक्ष माम् ॥ ११ ॥

॥ परिजन रक्षा ॥

आत्मानमात्मनः स्निग्धमाश्रितं परिचारकम् ।
द्रव्यदं बन्धुवर्गं च देवेशि परिरक्ष नः ॥ १२ ॥

॥ सुहृद रक्षा ॥

उपासकस्य यो यो मे यथाशक्त्यनुकूलकृत् ।
सुहृदं रक्ष तं नित्यं द्विषन्तमनुकूलय ॥ १३ ॥

॥ दैहिक-आदैहिक भय ॥

दैहिकादैहिकान्नानाहेतुकात्केवलाद्भयात् ।
पाहि मां प्रणतापत्तिभञ्जने विश्वलोचने ॥ १४ ॥

॥ निश्चला भक्ति ॥

नित्यानन्दमयं सौख्यं निर्मलं निरूपाधिकम् ।
देहि मे निश्चलां भक्तिं निखिलाभिष्टसिद्धिदे ॥ १५ ॥

॥ कर्तव्य बोध ॥

यन्मया सकलोपायैः करणीयमितः परम् ।
तत्सर्वं बोधयस्वाम्ब सर्वलोकहिते रते ॥ १६ ॥

॥ बुद्धियोग ॥

प्रदेहि बुद्धियोगं तं येन त्वामुपयाम्यहम् ।
कामानां हृद्यसंरोहं देहि मे कृपयेश्वरि ॥ १७ ॥

॥ भवाब्धि उद्धार ॥

भवाब्धौ पतितं भीतमनाथं दीनमानसम् ।
उद्धृत्य कृपया देवि निधेहि चरणाम्बुजे ॥ १८ ॥
॥ इति श्री बाला रक्षा स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

Explore More