॥ क्षुद्रजाल-पातक रक्षा ॥
रक्ष मां क्षुद्रजालेभ्यः पातकेभ्यश्च सर्वदा ॥ १ ॥
॥ जगद्दुरित निवारण ॥
जगद्दुरितजालेभ्यो रक्ष मामहितं हर ॥ २ ॥
॥ जन्मशत पाप नाश ॥
पापं नाशय देवेशि पाहि मां कृपयाऽनिशम् ॥ ३ ॥
॥ जन्मसहस्र दुष्कृत निवारण ॥
तन्निवारय मां पाहि शरण्ये भक्तवत्सले ॥ ४ ॥
॥ स्व-पर कृत पाप नाश ॥
पापानि नाशयस्वाद्य पाहि मां परदेवते ॥ ५ ॥
॥ ज्ञान-अज्ञान कृत पाप ॥
निवारय जगन्मातरखिलैरनिवारितम् ॥ ६ ॥
॥ सत्कार्य प्रवर्तन ॥
देवतात्मानुसन्धानं देहि मे परमेश्वरि ॥ ७ ॥
॥ देशिक स्मृति ॥
देशिकाङ्घ्रिस्मृतिं चैव देहि मे जगदीश्वरि ॥ ८ ॥
॥ निश्चल चित्त ॥
अत्यन्तनिश्चलं चित्तं देहि मे परमेश्वरि ॥ ९ ॥
॥ सदाशिवोपासित पद ॥
उपासितं पदं यत्तद्देहि मे परमेश्वरि ॥ १० ॥
॥ विघ्न निवारण ॥
कृतं विघ्नं निवार्याशु कृपया रक्ष रक्ष माम् ॥ ११ ॥
॥ परिजन रक्षा ॥
द्रव्यदं बन्धुवर्गं च देवेशि परिरक्ष नः ॥ १२ ॥
॥ सुहृद रक्षा ॥
सुहृदं रक्ष तं नित्यं द्विषन्तमनुकूलय ॥ १३ ॥
॥ दैहिक-आदैहिक भय ॥
पाहि मां प्रणतापत्तिभञ्जने विश्वलोचने ॥ १४ ॥
॥ निश्चला भक्ति ॥
देहि मे निश्चलां भक्तिं निखिलाभिष्टसिद्धिदे ॥ १५ ॥
॥ कर्तव्य बोध ॥
तत्सर्वं बोधयस्वाम्ब सर्वलोकहिते रते ॥ १६ ॥
॥ बुद्धियोग ॥
कामानां हृद्यसंरोहं देहि मे कृपयेश्वरि ॥ १७ ॥
॥ भवाब्धि उद्धार ॥
उद्धृत्य कृपया देवि निधेहि चरणाम्बुजे ॥ १८ ॥
