विष्वक्सेनो विश्वकर्मा वशी च ।
विश्वेश्वरो वासुदेवोऽसि तस्मा-
-द्योगात्मानं दैवतं त्वामुपैमि ॥ 47 ॥
जय योगीश्वर विभो जय योगपरावर ॥ 48 ॥
भूतभव्यभवन्नाथ जय सौम्यात्मजात्मज ॥ 49 ॥
नारायण सुदुष्पार जय शार्ङ्गधनुर्धर ॥ 50 ॥
विश्वेश्वर महाबाहो जय लोकार्थतत्पर ॥ 51 ॥
हरिवास दिशामीश विश्वावासामिताव्यय ॥ 52 ॥
असङ्ख्येयात्मभावज्ञ जय गम्भीरकामद ॥ 53 ॥
कृतकार्य कृतप्रज्ञ धर्मज्ञ विजयावह ॥ 54 ॥
भूताद्य लोकतत्त्वेश जय भूतविभावन ॥ 55 ॥
उद्भावनमनोभाव जय ब्रह्मजनप्रिय ॥ 56 ॥
अमृतोद्भव सद्भाव मुक्तात्मन् विजयप्रद ॥ 57 ॥
आत्मभूत महाभूत सत्वात्मन् जय सर्वदा ॥ 58 ॥
मूर्तिस्तेऽहं सुराः कायश्चन्द्रादित्यौ च चक्षुषी ॥ 59 ॥
तेजोऽग्निः पवनः श्वास आपस्ते स्वेदसम्भवाः ॥ 60 ॥
वेदाः संस्कारनिष्ठा हि त्वयीदं जगदाश्रितम् ॥ 61 ॥
न बलं योगयोगीश जानीमस्ते न सम्भवम् ॥ 62 ॥
अर्चयामः सदा विष्णो परमेशं महेश्वरम् ॥ 63 ॥
पिशाचा मानुषाश्चैव मृगपक्षिसरीसृपाः ॥ 64 ॥
पद्मनाभ विशालाक्ष कृष्ण दुःखप्रणाशन ॥ 65 ॥
त्वत्प्रसादेन देवेश सुखिनो विबुधाः सदा ॥ 66 ॥
तस्माद्भव विशालाक्ष यदुवंशविवर्धनः ॥ 67 ॥
जगतो धारणार्थाय विज्ञाप्यं कुरु मे प्रभो ॥ 68 ॥
वासुदेव तदेतत्ते मयोद्गीतं यथातथम् ॥ 69 ॥
कृष्ण त्वमात्मनो साक्षी प्रद्युम्नं चात्मसम्भवम् ॥ 70 ॥
अनिरुद्धोऽसृजन्मां वै ब्रह्माणं लोकधारिणम् ॥ 71 ॥
[तस्माद्याचामि लोकेश चतुरात्मानमात्मना।]
विभज्य भागशोऽऽत्मानं व्रज मानुषतां विभो ॥ 72 ॥
धर्मं प्राप्य यशः प्राप्य योगं प्राप्स्यसि तत्त्वतः ॥ 73 ॥
तैस्तैर्हि नामभिर्युक्ता गायन्ति परमात्मकम् ॥ 74 ॥
कृत्वाश्रयं त्वां वरदं सुबाहो ।
अनादिमध्यान्तमपारयोगं
लोकस्य सेतुं प्रवदन्ति विप्राः ॥ 75 ॥
