दत्तात्रेय प्रभु चरणन में, करूँ बारम्बार प्रणाम॥
ज्ञान वैराग्य के सागर, दिगम्बर अवधूत।
शरण तुम्हारी आया हूँ, हरो सकल भव-भूत॥
आदिगुरु जग के प्रतिपाला॥
ब्रह्मा विष्णु शिव त्रय अवतारा।
एक देह में रूप अपारा॥
अनुसूया माता सुविख्याता॥
तीन शीश षट् भुज सुखकारी।
दिगम्बर रूप अनुपम धारी॥
रुद्राक्षमाल शोभित मंगल॥
बाम भुज चक्र शंख सुशोभे।
देखत रूप सुर नर मन मोहे॥
कामधेनु संग विराजत मानो॥
भस्म रमाये जटाजूट धारी।
अवधूत अनघ महिमा भारी॥
पृथ्वी जल वायु से पाया माना॥
सूर्य चंद्र आकाश महासागर।
मधुमक्खी अजगर चातक चंचल॥
उद्धव गीता का ज्ञान अर्पिन्हा॥
श्रीमद् भागवत में लीला गाई।
आदिगुरु की महिमा अकथनी भाई॥
कार्तवीर्य अर्जुन की सिद्धि लीन्हीं॥
सहस्रार्जुन हो भक्त मनाया।
दत्त प्रभु ने मोक्ष-पथ दिखाया॥
दत्त नाम लेत दुख मिट जावे॥
काल सर्प दोष भी हरते स्वामी।
भक्त जनों के अन्तर्यामी॥
दत्त शरण लें होय शान्त मन॥
गुरुवार को पाठ जो नित्य करे।
जीवन के सब संकट से उबरे॥
जीवन्मुक्त स्वरूप तुम्ही हो॥
त्रिपुरा रहस्य ज्ञान-धाम।
दत्त प्रभु तेरा ही नाम॥
दत्त दर्शन से भव-बाधा टले॥
सात वार परिक्रमा जो करे।
दत्त प्रसाद सहज उसे मिले॥
त्रिदेव शिशु रूप में घर आया॥
ब्रह्मा-हरि-हर एक हो गये।
दत्त नाम से जग में छा गये॥
दत्त नाम लेत भक्त उबारे॥
जो नर इस चालीसा को गावे।
दत्तात्रेय की कृपा वह पावे॥
जय त्रिमूर्ति जय अन्तर्यामी॥
दत्त चालीसा नित जो पढ़े।
ज्ञान-मुक्ति-भक्ति सदा बढ़े॥
पितृ दोष हरि मुक्ति दे, खुले ज्ञान के रोज॥
अत्रि-नन्दन दत्त प्रभु, करहु कृपा अपार।
भक्त जनों को मोक्ष दो, उतरें भव से पार॥
