सेवा से सब विध्न टरें।
तीन लोक तैतिस देवता,
द्वार खड़े सब अर्ज करे॥
अरु आनन्द सों चवर करें।
धूप दीप और लिए आरती,
भक्त खड़े जयकार करें॥
मुषक वाहन चढ़ा करें।
सौम्यरुप सेवा गणपति की,
विध्न भागजा दूर परें॥
दिन दोपारा पूर परें।
लियो जन्म गणपति प्रभुजी ने,
ठुगी मन आनन्द भरें॥
देव वधू जहँ गान करें।
श्री शंकर के आनन्द उपज्यो,
नाम सुन्न्या सब विधघ्न टर्रें॥
इन्द्र अप्सरा नृत्य करें।
देख वेद ब्रह्ममाजी जाको,
विघ्न विनाशक नाम धरें॥
त्रिनयन रूप अनूप धरें।
पगथ्थंभा सा उदर पुष्ट है,
देख चन्द्रमा हास्य करें॥
कलाहीन तत्काल करें।
चौदह लोक में फिरे गणपति,
तीन भुवन में राज्य करें॥
काम सभी निर्विघ्न सरें।
श्री प्रताप गणपतीजी को,
हाथ जोड स्तुति करें॥
