॥ ऋष्यादि न्यासः ॥
भैरव ऋषिः (शिरसि स्पृशेत्)।
अनुष्टुप् छन्दः (मुखे)।
श्री मंत्रिणी देवता (हृदि)।
ॐ बीजम् (गुह्ये)।
ह्रीं शक्तिः (पादयोः)।
स्वाहा कीलकम् (नाभौ)।
मम सर्वसिद्ध्यर्थे न्यासे विनियोगः (सर्वाङ्गे)॥
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः। (अंगूठे से तर्जनी को स्पर्श करें)
ॐ श्रीं मध्यमाभ्यां नमः। (अंगूठे से मध्यमा को स्पर्श करें)
ॐ ऐं क्लीं सौः अनामिकाभ्यां नमः। (अंगूठे से अनामिका को स्पर्श करें)
ॐ मंत्रिण्यै कनिष्ठिकाभ्यां नमः। (अंगूठे से कनिष्ठिका को स्पर्श करें)
ॐ स्वाहा करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः। (हथेलियों के अग्र और पृष्ठ भाग को स्पर्श करें)
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा। (सिर को स्पर्श करें)
ॐ श्रीं शिखायै वषट्। (शिखा/चोटी को स्पर्श करें)
ॐ ऐं क्लीं सौः कवचाय हुम्। (दाएं हाथ से बाएं कंधे और बाएं से दाएं कंधे को स्पर्श करें)
ॐ मंत्रिण्यै नेत्रत्रयाय वौषट्। (तर्जनी, मध्यमा, अनामिका से दोनों नेत्रों व भ्रूमध्य को स्पर्श करें)
ॐ स्वाहा अस्त्राय फट्। (दाएं हाथ से बाएं हाथ पर ताली बजाएं)
ॐ रां राज्ञ्यै ललाटे नमः। (माथे पर)
ॐ हीं ह्रीं दंष्ट्रायै भ्रूमध्ये नमः। (भृकुटी के मध्य)
ॐ मं मंत्रिण्यै नेत्रयोः नमः। (दोनों नेत्रों पर)
ॐ त्रीं त्रिनेत्रायै कर्णयोः नमः। (दोनों कानों पर)
ॐ णीं दण्डिन्यै नासिकायां नमः। (नासिका/नाक पर)
ॐ यं यज्ञवाराह्यै मुखे नमः। (मुख पर)
ॐ नं नीलाम्बरायै कण्ठे नमः। (कण्ठ/गले पर)
ॐ मः महावाराह्यै हृदये नमः। (हृदय पर)
ॐ स्तं स्तनयोः नमः। (दोनों स्तनों पर)
ॐ घुं घुर्घुरायै नाभौ नमः। (नाभि पर)
ॐ णां संहारिण्यै कट्यां नमः। (कमर पर)
ॐ पां पातालवासिन्यै जानुनोः नमः। (दोनों घुटनों पर)
ॐ दां दण्डनाथायै जङ्घयोः नमः। (दोनों जंघाओं पर)
ॐ यां जगदम्बायै पादयोः नमः। (दोनों पैरों पर)
ॐ ह्रीं वाराह्यै सर्वाङ्गे नमः। (संपूर्ण शरीर पर)
ॐ ह्रीं मंत्रिणि, दक्षिणे रक्ष रक्ष। (दक्षिण दिशा में चुटकी बजाएं)
ॐ ह्रीं दण्डिनि, पश्चिमे रक्ष रक्ष। (पश्चिम दिशा में चुटकी बजाएं)
ॐ ह्रीं संहारिणि, उत्तरे रक्ष रक्ष। (उत्तर दिशा में चुटकी बजाएं)
ॐ ह्रीं महावाराहि, ऊर्ध्वे रक्ष रक्ष। (ऊपर की ओर चुटकी बजाएं)
ॐ ह्रीं पातालवासिनि, अधः रक्ष रक्ष। (नीचे की ओर चुटकी बजाएं)
वाराहवदनां देवीं मंत्रिणीं प्रणमाम्यहम्॥
पाशाङ्कुशधरां देवीं दण्डिनीं परमेश्वरीम्॥
