अनिच्छयाऽपि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥ 1 ॥
जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥ 2 ॥
यत्कृतं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥ 3 ॥
तानि सर्वाण्यशेषाणि हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥ 4 ॥
दत्तं स्यात्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥ 5 ॥
अधीतस्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥ 6 ॥
इष्टं स्यात्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥ 7 ॥
दुःखात्यन्त परित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥ 8 ॥
सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥ 9 ॥
आयुष्यं बलमारोग्यं यशो वृद्धिः श्रियावहम् ॥ 10 ॥
यः पठेत्स नरो याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ 11 ॥
