कुमार्या देवतामुख्याः परमानन्दवर्धनम् ॥ १॥
यदि मे वर्तते विद्ये यदि स्नेहकलामला ॥ २॥
महास्तोत्रं कोटिकोटि कन्यादानफलं भवेत् ॥ ३॥
अष्टोत्तरसहस्राख्यं कुमार्याः परमाद्भुतम् ॥ ४॥
सर्वत्र दुर्लभं धन्यं धन्यलोकनिषेवितम् ॥ ५॥
मायामन्त्रनिरस्ताङ्गं मन्त्रसिद्धिप्रदे नृणाम् ॥ ६॥
अकस्मात् सिद्धिमवाप्नोति सहस्रनामपाठतः ॥ ७॥
मन्त्रार्थं मन्त्रचैतन्यं योनिमुद्रास्वरूपकम् ॥ ८॥
तथापि वक्तुमिच्छामि हिताय जगतां प्रभो ॥ ९॥
कनकाभा काञ्चनाभा कमला कालकामिनी ॥ ११॥
कान्ता कुमारकान्ता च कारणा करिगामिनी ॥ १२॥
कार्याकार्यप्रिया कक्षा कंसहन्त्री कुरुक्षया ॥ १३॥
कामहा कपिला काला कालिका कुरुकामिनी ॥ १४॥
कलञ्जभक्षा कैकेयी काकपुच्छध्वजा कला ॥ १५॥
कामधेनुस्वरूपा च कामहा काममदीनी ॥ १६॥
भैरवी कारणाढ्या च कैशोरी कुशलाङ्गला ॥ १७॥
कङ्कणालङ्कृता कङ्का केवला काकिनी किरा ॥ १८॥
केशिनी केशिहा केशा कासाम्बष्ठा करिप्रिया ॥ १९॥
कोटरा कोटराक्षी च करनाटकवासिनी ॥ २०॥
केलिप्रिया कम्बलस्था कालदैत्यविनाशिनी ॥ २१॥
कर्पूराकरकाकोला कैलासगिरिवासिनी ॥ २२॥
खर्बा खड्गधरा खड्गा खलहा खलबुद्धिदा ॥ २३॥
खेलना खेटककरा खरवाक्या खरोत्कटा ॥ २४॥
खेटकस्था खलाखस्था खेचरी खेचरप्रिया ॥ २५॥
खेचरेशी खरोग्रा च खेचरप्रियभाषिणी ॥ २६॥
खातमध्यस्थिता खाता खाताम्बुपरिपूरिणी ॥ २७॥
खल्वा खलतरा खारी खरोद्वेगनिकृन्तनी ॥ २८॥
गङ्गा गभीरा गौरी च गणनाथ प्रिया गतिः ॥ २९॥
गोगणस्था गाणपत्या गिरिजा गिरिपूजिता ॥ ३०॥
गाधिराजसुता ग्रीवा गुर्वी गुर्व्यम्बशाङ्करी ॥ ३१॥
गुग्गुलुस्था गुरोः पूज्या गीतानन्दप्रकाशिनी ॥ ३२॥
गुरुकन्या गुरोः पत्नी गहना गुरुनागिनी ॥ ३३॥
गुह्या गुह्यगणस्था च गरिमा गौरिका गुदा ॥ ३४॥
गान्धर्वी गाननगरी गन्धर्वगणपूजिता ॥ ३५॥
घनदा घनवर्णा च घनवाहनवाहना ॥ ३६॥
घटिता घटना घोना घनरुप घनेश्वरी ॥ ३७॥
घोरनेत्रा घनरुचा घोरभैरव कन्यका ॥ ३८॥
घोरान्धकारसंस्था च घसना घस्वरा घरा ॥ ३९॥
घननीलमणिश्यामा घर्घरेश्वरकामिनी ॥ ४०॥
ङकारी ङसंशा चैव ङीपनीता ङकारिणी ॥ ४१॥
चारुचन्द्रमुखी चैव चलङ्गमगतिप्रिया ॥ ४२॥
चलिता चानना चार्व्वो चारुभ्रमरनादिनी ॥ ४३॥
चक्रकौला चक्ररूपा चक्रस्था चक्रसिद्धिदा ॥ ४४॥
चक्राभेद्या चक्रकुला चक्रमण्डलशोभिता ॥ ४५॥
चतुर्वेदस्थिता चण्डा चन्द्रकोटिसुशीतला ॥ ४६॥
चक्षुःस्था चक्षुवसतिश्चणका चणकप्रिया ॥ ४७॥
चर्व्वरीशा चारुमुखी चारुदन्ता चरस्थिता ॥ ४८॥
चाक्षुषी चन्द्रमलिनी चन्द्रहासमणिप्रभा ॥ ४९॥
छलज्ञा छेश्वराछाया छाया छिन्नशिवा छला ॥ ५०॥
छिन्नातीता छिन्नमस्ता छिन्नकेशा छलोद्भवा ॥ ५१॥
छलछिन्ना छद्मवती छद्मसद्मनिवासिनी ॥ ५२॥
छगला रक्तभक्षा च छगलामोदरक्तपा ॥ ५३॥
छुरिका छुरिककरा छुरिकारिनिवाशिनी ॥ ५४॥
छलोद्वेगा छाङ्गबीजमाला छाङ्गवरप्रदा ॥ ५५॥
जन्त्रस्था जीवहा जीवा जयदा जीवयोगदा ॥ ५६॥
जामलप्रियकन्या च जामलेशी जवाप्रिया ॥ ५७॥
जलस्था जगविषया जरातीता जलस्थिता ॥ ५८॥
जतुका जलपूज्या च जगन्नाथादिकामिनी ॥ ५९॥
जामदा जमदा जृम्भा जृम्भणास्त्रादिधारिणी ॥ ६०॥
जमलार्जुनदर्पघ्नी जमलार्जुनभञ्जिनी ॥ ६१॥
जपमाला जाप्यसिद्धिर्जपयज्ञप्रकाशिनी ॥ ६२॥
जवाहन्त्री जगद्बुद्धिर्ज्जगत्कर्तृ जगद्गतिः ॥ ६३॥
झङ्कला झङ्कमध्यस्था झणत्कारस्वरूपिणी ॥ ६४॥
झटिताक्षा झरा झञ्झा झर्झरा झरकन्यका ॥ ६५॥
झङ्करी झर्झरी झल्ली झल्वेश्वरनिवासिनी ॥ ६६॥
ञनयोऽन्ता ञकारान्ता ञकारपरमेश्वरी ॥ ६७॥
ञैकनेला ञस्वरूपा ञहारा ञहरीतकी ॥ ६८॥
टपला टापबालाख्या टङ्कारध्वनिरूपिणी ॥ ६९॥
टङ्कास्त्रधारिणी टाना टमोटार्णलभाषिणी ॥ ७०॥
टङ्कारधरनामाहा टिवीखेचरनादिनी ॥ ७१॥
डमरूप्रियवाद्या च डामरस्था डबीजिका ॥ ७२॥
डगरार्द्धा डलातीता डदारुकेश्वरी डुता ॥ ७३॥
ढकेस्था ढेश्वरसुता ढेमनाभावढोनना ॥ ७४॥
णनो माणाङ्ककल्याणी णाक्षवीणाक्षबीजिका ॥ ७५॥
तपस्या तापससुता तारिणी तरुणी तला ॥ ७६॥
तालभक्षत्रिधामूत्तीस्तारका तैलभक्षिका ॥ ७७॥
तपसः तालसन्दर्भा तर्जयन्ती कुमारिका ॥ ७८॥
तक्षकालङ्कृता तोषा तावद्रूपा तलप्रिया ॥ ७९॥
तल्वल्वप्रहरालीता तलारिगणनाशिनी ॥ ८०॥
तरुणा तप्तबुद्धिस्थास्तप्ता प्रधारिणी तपा ॥ ८१॥
तुषारकिरणाङ्गी च चतुर्धा वा समप्रभा ॥ ८२॥
ताम्रपर्णा ताम्रकेशा ताम्रपात्रप्रियातमा ॥ ८३॥
तोषयुक्ता तमायाची तमषोढेश्वरप्रिया ॥ ८४॥
तक्रभक्षा तालसिद्धिः तत्रस्थास्तत्र गामिनी ॥ ८५॥
तन्त्रमन्त्रप्रकाशा च त्रिशरेणुस्वरूपिणी ॥ ८६॥
थकारकूटदण्डीशा थदण्डीशप्रियाऽथवा ॥ ८७॥
थान्ता थमीश्वरी थाका थकारबीजमालिनी ॥ ८८॥
दशा दशनघोरा च देवीदासप्रिया दया ॥ ८९॥
दान्ता दान्तप्रिया दासा दामना दीर्घकेशिका ॥ ९०॥
देवमाता च दुर्लभा च दीर्घाङ्गा दासकन्यका ॥ ९१॥
दमयन्ती दलस्था च द्वेष्यहन्त्री दशस्थिता ॥ ९२॥
दारिद्र्यहा दरिद्रस्था दरिद्रधनदायिनी ॥ ९३॥
द्वेषरूपा द्वेषहन्त्री द्वेषारिगणमोहिनी ॥ ९४॥
दिग्दर्शना दर्शनस्था दर्शनप्रियवादिनी ॥ ९५॥
द्राविणी द्रविणी दक्षा दक्षकन्या दलदृढा ॥ ९६॥
दधिप्रिया दधिस्था च दधिमङ्गलकारिणी ॥ ९७॥
दर्भस्था द्रुपदसुता द्रौपदी द्रुपदप्रिया ॥ ९८॥
धनहा धनदा धन्वी धनुर्हस्ता धनुःप्रिया ॥ ९९॥
धोरा धीरप्रियाधारा धराधारणतत्परा ॥ १००॥
धाराधरस्था धन्या च धर्मपुञ्जनिवासिनी ॥ १०१॥
धर्मार्थकाममोक्षाङ्गी धर्मार्थकाममोक्षदा ॥ १०२॥
धरा च धामरूपा च ध्रुवा ध्रौव्या ध्रुवप्रिया ॥ १०३॥
धर्मतेजोमयी धर्म्या धैर्याग्रभर्गमोहिनी ॥ १०४॥
नारायणी नरेन्द्रस्था नारायणकलेवरा ॥ १०५॥
नित्या नापितकन्या च नयनस्था नरप्रिया ॥ १०६॥
नवीननायकप्रीता नव्या नवफलप्रिया ॥ १०७॥
नारी निम्बस्थितानन्दानन्दिनी नन्दकारिका ॥ १०८॥
नन्दनस्था नन्दकन्या नन्दमोक्षप्रदायिनी ॥ १०९॥
नवबुद्धिप्रियानेका नाकस्था नामकन्यका ॥ ११०॥
निम्बवृक्षस्थिता निम्बा नानावृक्षनिवासिनी ॥ १११॥
नभःस्था नायकप्रीता नायकप्रियकामिनी ॥ ११२॥
निम्ननाभिप्रियाकारा नरेन्द्रहस्तपूजिता ॥ ११३॥
परेश्वरी परानन्दा परापरविभेदिका ॥ ११४॥
पारमेशी पर्वनाना पुष्पमाल्यप्रिया परा ॥ ११५॥
प्रथमा प्रथमा प्रीता पुष्पगन्धप्रिया परा ॥ ११६॥
परमानरता पुंसां पाशहस्ता पशुप्रिया ॥ ११७॥
पलाशपुष्पसङ्काशा पलाशपुष्पमालिनी ॥ ११८॥
पद्ममाला पापहरा पतिप्रेमविलासिनी ॥ ११९॥
फलमूलाशना फाली फलदा फाल्गुनप्रिया ॥ १२०॥
फेत्कारीतन्त्रमुख्या च फेत्कारगणपूजिता ॥ १२१॥
फलप्रिया फलाशक्ता फाल्गुनानन्ददायिनी ॥ १२२॥
वसुदेवगृहस्था च वासवी वीरपूजिता ॥ १२३॥
ब्राह्मी बृहस्पतिसुता वाचस्पतिवरप्रदा ॥ १२४॥
बोधज्ञा वौषडाख्या च वंशीवंदनपूजिता ॥ १२५॥
भारती भवरश्रीदा भवपत्नी भवात्मजा ॥ १२६॥
भूर्भुवःस्वःस्वरूपा च भृशार्त्ता भेकनादिनी ॥ १२७॥
भर्ता भगवती भाग्या भगीरथनमस्कृता ॥ १२८॥
भृगुवंशा भीतिहरा भूमिर्भुजगहारिणी ॥ १२९॥
मकरस्था मत्तगतिर्मदमत्ता मदप्रिया ॥ १३०॥
मदिरासिद्धिदा मध्या मदान्तर्गतिसिद्धिदा ॥ १३१॥
मुषला मुक्तिदा मूर्त्ता मूकीकरणतत्परा ॥ १३२॥
मैथुनानन्दसिद्धिश्च मैथुनानलसिद्धिदा ॥ १३३॥
मनःस्था माधवीमुख्या महादेवमनोरमा ॥ १३४॥
यशोराशिविभूषाङ्गी यतिप्रेमकलावती ॥ १३५॥
रुद्राणी रूपदा रूपा रूपसुन्दरधारिणी ॥ १३६॥
रेन्द्रादेवसुतारेदा रिपुवर्गान्तकप्रिया ॥ १३७॥
रौप्यवर्णा रौद्रवर्णा रौप्यालङ्कारभूषणा ॥ १३८॥
लक्ष्मीः लाङ्गलहस्ता च लाङ्गली कुलकामिनी ॥ १३९॥
लिम्पती लेलिहा लोला लोमशप्रियसिद्धिदा ॥ १४०॥
लक्ष्मणा लक्ष्मीहीना च लप्रिया लार्णमध्यगा ॥ १४१॥
वातस्था वातरूपा च वेलमध्यनिवासिनी ॥ १४२॥
शवस्था परसिद्ध्यर्थी शववक्षसि शोभिता ॥ १४३॥
षट्चक्रभेदिनी षोढा न्यासजालदृढानना ॥ १४४॥
हरिप्रिया हरहालालावण्यस्था क्षमा क्षुधा ॥ १४५॥
आद्या इन्द्रप्रिया ईशा उमा ऊढा ऋतुप्रिया ॥ १४६॥
एकादशीव्रतस्था च एन्द्री ओषधिसिद्धिदा ॥ १४७॥
इत्येतत् कामुकीनाथ कुमारीणां सुमङ्गलम् ॥ १४८॥
महास्तोत्रं धर्मसारं धनधान्यसुतप्रदम् ॥ १४९॥
स सर्वदा दिवारात्रौ स भवेन्मुक्तिमार्गगः ॥ १५०॥
सर्वे देवा वशं यान्ति वशीभूताश्च मानवाः ॥ १५१॥
ये वशन्ति च भूर्लोके देवतुल्यपराक्रमाः ॥ १५२॥
अकस्मात् सिद्धिमाप्नोति होमेन यजनेन च ॥ १५३॥
विना यज्ञैवीना दानैवीना जाप्यैर्लभेत् फलम् ॥ १५४॥
तस्य शान्तिर्भवेत् क्षिप्रं कन्यास्तोत्रं पठेत्ततः ॥ १५५॥
वारैकपठितो मन्त्री धर्मार्थकाममोक्षभाक् ॥ १५६॥
वारत्रयक्रमेणैव वारैकक्रमतोऽपि वा ॥ १५७॥
त्रिजगन्मोहयेन्मन्त्री वत्सरार्द्धं प्रपाठतः ॥ १५८॥
चिरजीवी खेचरत्त्वं प्राप्य योगी भवेन्नरः ॥ १५९॥
महिलामण्डले स्थित्त्वा शक्तियुक्तः पठेत् सुधीः ॥ १६०॥
सर्वदा यः पठेन्नाथ भावोद्गतकलेवरः ॥ १६१॥
जलादिस्तम्भने शक्तो वह्निस्तम्भादिसिद्धिभाक् ॥ १६२॥
कविनाथो महाविद्यो वन्धकः पण्डितो भवेत् ॥ १६३॥
कान्तिं श्रियं यशो वृद्धिं प्राप्नोति बलवान् यतिः ॥ १६४॥
उज्जटेऽरण्यमध्ये च पर्वते घोरकानने ॥ १६५॥
ग्रामे भग्नगृहे वापि शून्यागारे नदीतटे ॥ १६६॥
धान्यक्षेत्रे देवगृहे कन्यागारे कुलालये ॥ १६७॥
निर्भयादिस्वदेशेषु शिवलिङ्गालयेऽथवा ॥ १६८॥
अश्वत्थमूले बिल्वे वा कुलवृक्षसमीपगे ॥ १६९॥
दिव्ये वा वीरभावस्थो यष्ट्वा कन्यां कुलाकुलै ॥ १७०॥
मांसासवेन जुहुयान्मुक्तेन रसेन च ॥ १७१॥
तासामुच्छिष्टमानीय जुहुयाद् रक्तपङ्कजे ॥ १७२॥
पिबेन्मांसरसं मन्त्री सदानन्दो महाबली ॥ १७३॥
तारो माया रमावह्निजायामन्त्रं पठेत् सुधीः ॥ १७४॥
स्वयं प्रसादं भुक्त्वा हि सर्वविद्याधिपो भवेत् ॥ १७५॥
महासवघटेनापि दत्त्वा पठति यो नरः ॥ १७६॥
रुद्ररूपो भवेन्नित्यं महाकालात्मको भवेत् ॥ १७७॥
क्षीराब्धिरत्नकोषेशो वियद्व्यापी च योगिराट् ॥ १७८॥
महाशत्रुपातने च महाशत्रुभयाद्दीते ॥ १७९॥
समर्दयेत् शत्रून् क्षिप्रमन्धकारं यथा रविः ॥ १८०॥
पठनाद्धारणान्मर्त्त्यो देवा वा राक्षसादयः ॥ १८१॥
पुरुषो दक्षिणे बाहौ नारी वामकरे तथा ॥ १८२॥
गजान्तकं नाथ सहस्रनाम च ।
पठेन्मनुष्यो यहि भक्तिभावत-
स्तदा हि सर्वत्र फलोदयं लभेत् च ॥ १८४॥
ये नित्यं हि मुदा पठन्ति विफलं सार्थञ्च चिन्ताकुलाः
ते नित्याः प्रभवन्ति कीतीकमले श्रीरामतुल्यो जये
कन्दर्पायुततुल्यरूपगुणिनः क्रोधे च रुद्रोपमाः ॥ १८५॥
