श्री वामन प्रभु ध्यान धर, देयो अभय वरदान॥
संकट मुक्त निक राखियो, हे लक्ष्मीपति करतार।
चरण शरण दे लीजिये, विष्णु बटुक अवतार॥
तीनो लोक तुम्ही रणधीरा॥
ब्राह्मण गुण रूप धरो जब।
टोना भारी नाम पड़ो तब॥
वामन बाबा नाम कहाओ॥
बायें अंग जनेऊ साजे।
तीनो लोक में डंका बाजे॥
मस्तक तिलक केसरिया साजे॥
कमर लंगोटा चरण खड़ाऊँ।
वामन महिमा निशदिन गाऊँ॥
दीन दुखी के प्राणं हारे॥
धरो रूप जब दिव्य विशाला।
बलि भयो तब अति कंगाला॥
समझ गया नप है जग सारा॥
नस बलि ने जब होश संभाला।
प्रकट भये तब दीन दयाला॥
वामन नाम में हुआ प्रकाशा॥
दीपक जो कोई नित्य जलाता।
संकट कटे अमर हो जाता॥
पुत्र प्राप्ति पल भर में पाता॥
तुम्हरी शरण हे जो आता।
सदा सहाय लक्ष्मी माता॥
कश्यप वंश अदिति दुलारे॥
वामन ग्राम से श्री हरी आरी।
महिमा न्यारी पूर्ण भारी॥
जहां पर कृपा मिटे सब पीड़ा॥
पूरा हुआ ना बलि का सपना।
तीनो लोक तीनो अपना॥
राक्षस कुल को तुरंत रोऊ॥
तुम्हरा वैभव नहीं बखाना।
सुर नर मुनि सब गावै ही गाना॥
रोग ऋण ना कोई तन को॥
आये वामन द्वारा मन को।
सब जन जन और जीवन धन को॥
पाताल लोक के हो आभारी॥
जो जन नाम रटत हैं तुम्हरा।
रखते बाबा उसपर पहरा॥
चरण शरण जो तुम्हरी ठहरा॥
पंचवटी में शोर निवासा।
चारो और तुम हो प्रकाशा॥
रंक का किया आचरण पल में राजा॥
सम्पति सुमिति तोरे दरवाजे।
ढोल निगाडे गाजे बाजे॥
वामन ग्राम में तुम्हे ही विराजे॥
रिद्धि सिद्धि के दाता तुम हो।
दीन दुःखी के भ्राता तुम हो॥
तुम बिन पाये ना कोई निवाला॥
तुम्हरी गाये सदा जो शरणा।
उनकी इच्छा पूरी करना॥
दुःख दरिद्र को दूर भगाता॥
तुमरा गान सदा जो गाता।
उनके तुम हो भाग्य विद्याता॥
असुर जाति खर-खर-खर खापैं॥
वामन महिमा जो जन गाईं।
जन्म मरण का को कछु छुटी जाई॥
दिव्य ज्योति में वहां छिप जाई॥
संकट कितना भी गंभीरा।
वामन तोड़ सब गंभीरा॥
कृपा करो केवट की नाईं॥
अंत काल बैकुंठ निवासा।
फिर सिंदु में करे विलासा॥
छत सी छाया राखियों, तुलसीदास हरिदास ॥
