ऊठकर ब्रह्ममुहुर्त शुभ कर लो प्रभात॥
ज्ञानहीन तनु जान के भजहौंह शिव कुमार।
ज्ञान ध्यान देही मोही देहु भक्ति सुकुमार॥
जय-जय शिव पार्वती नन्दन॥
जय पार्वती प्राण दुलारे।
जय-जय भक्तन के दुःख टारे॥
स्वर्ण मुकुट रूद्राक्षमाला॥
ताम्र तन सुन्दर मुख सोहे।
सुर नर मुनि मन छवि लय मोहे॥
आओ वीरभद्र कफली वाले॥
करि भक्तन सँग हास विलासा।
पूरन करि सबकी अभिलासा॥
ऐसे वीरभद्र हितकारी॥
ज्ञान ध्यान से दर्शन दीजै।
बोलो शिव वीरभद्र की जै॥
डूबत भँवर बचावत शुद्रा॥
वीरभद्र मम कुमति निवारो।
क्षमहु करो अपराध हमारो॥
आठों सिद्घि दौडती आवै॥
जय वीरभद्र तप बल सागर।
जय गणनाथ त्रिलोग उजागर॥
हनुमत समबल बुद्घि धामा॥
दक्षप्रजापति यज्ञ की ठानी।
सदाशिव बिन सफल यज्ञ जानी॥
यज्ञ सभा सति प्रस्थान कीन्ही॥
सबहु देवन भाग यज्ञ राखा।
सदाशिव करि दियो अनदेखा॥
तत्क्षण सती सशरीर त्यागो॥
शिव का क्रोध चरम उपजायो।
जटा केश धरा पर मार्यो॥
वीरभद्र रूप रौद्र दिखाएँ॥
कृष्ण वर्ण निज तन फैलाए।
सदाशिव सँग त्रिलोक हर्षाए॥
शत्रुपक्ष पर दऊ चरण धर लिन्हो॥
रणक्षेत्र में ध्वँस मचायो।
आज्ञा शिव की पाने आयो॥
त्रिमस्तक सहस्र भुजधारी॥
महाकाली प्रकटहु आई।
भ्राता वीरभद्र की नाई॥
वीरभद्र अरू कालिका टूट पडे चहुँ ओर॥
