बलिहारी जाऊँ गुरू देव ने, दिया हरि भजन में सीर॥
भक्ति मुक्ति विश्व कल्याणी॥
वीणा पुस्तक कर में सोहे।
शारदा सब जग सोहे॥
हँस वाहिनी जय जग माता।
भक्त जनन की हो सुख दाता॥
ब्रह्माणी ब्रह्मा लोक से आई।
मात लोक की करो सहाई॥
देवों ने जय बोली तब ही॥
चतुर्दश रतनों में मानी।
अदभुत माया वेद बखानी॥
चार वेद षट शास्त्र कि गाथा।
शिव ब्रह्मा कोई पार न पाता॥
आदि शक्ति अवतार भवानी।
भक्त जनों की मां कल्याणी॥
माता शस्त्र कर में धारे॥
पाप विनाशिनी तू जगदम्बा।
धर्म हेतु ना करी विलम्बा॥
नमो नमो ब्रह्मी सुखकारी।
ब्रह्मा विष्णु शिव तोहे मानी॥
तेरी लीला अजब निराली।
सहाय करो माँ पल्लू वाली॥
अमंगल में मंगल करणी॥
अन्नपूरणा हो अन्न की दाता।
सब जग पालन करती माता॥
सर्व व्यापिनी असंख्या रूपा।
तो कृपा से टरता भव कूपा॥
चंद्र बिंब आनन सुखकारी।
अक्ष माल युत हंस सवारी॥
लंक जार अनल सित लाई॥
कोप किया दश कन्ध पे भारी।
कुटम्ब संहारा सेना भारी॥
तु ही मात विधी हरि हर देवा।
सुर नर मुनी सब करते सेवा॥
देव दानव का हुआ सम्वादा।
मारे पापी मेटी बाधा॥
मोहनी रूप धरा तू माई॥
देव दैत्यों की पंक्ती बनाई।
देवों को मां सुधा पिलाई॥
चतुराई कर के महा माई।
असुरों को तू दिया मिटाई॥
नौ खण्ङ मांही नेजा फरके।
भागे दुष्ट अधम जन डर के॥
आस्विन मास पख उजियाला॥
रवि सुत बार अष्टमी ज्वाला।
हंस आरूढ कर लेकर भाला॥
नगर कोट से किया पयाना।
पल्लू कोट भया अस्थाना॥
चौसठ योगिनी बावन बीरा।
संग में ले आई रणधीरा॥
द्वार पाल सादुल अगवाणी॥
सांझ सवेरे बजे नगारा।
उठता भक्तों का जयकारा॥
मढ़ के बीच खड़ी मां ब्रह्माणी।
सुन्दर छवि होंठो की लाली॥
पास में बैठी मां वीणा वाली।
उतरी मढ़ बैठी महाकाली॥
मन हर्षाता दर्शन करके॥
चैत आसोज में भरता मेला।
दूर दूर से आते चेला॥
कोई संग में, कोई अकेला।
जयकारो का देता हेला॥
कंचन कलश शोभा दे भारी।
दिव्य पताका चमके न्यारी॥
आशीष से झोली भर लेते॥
तीन लोकों की करता भरता।
नाम लिए सब कारज सरता॥
मुझ बालक पे कृपा की ज्यो।
भुल चूक सब माफी दीज्यो॥
मन्द मति यह दास तुम्हारा।
दो मां अपनी भक्ती अपारा॥
जब लगि जिऊ दया फल पाऊं।
तुम्हरो जस मैं सदा ही गाऊं॥
भव से पार करो मातेश्वरी, अपना अनुगत जान॥
