दरस परस ते पाप मिटे, श्रीकृष्ण प्राण आधार॥
शेष महेश वदंन करत, महिमा न जाय बखानि॥
प्रकटी मुक्ति हेतु जग, सेवहि उतरहि पार॥
भक्ति चरण चित्त देई के, कीजै भव ते पार॥
जय कालिन्दि कृष्ण पटरानी॥
रूप अनूप शोभा छवि न्यारी।
माधव-प्रिया ब्रज शोभा भारी॥
पूर्ण मनोरथ मुरारी कीन्हा॥
निज अर्धांगी तुम्ही अपनायों।
सावँरो श्याम पति प्रिय पायो॥
नीर रेणू दमकत ज्यूँ मोती॥
सूर्यसुता श्यामल सब अंगा।
कोटिचन्द्र ध्युति कान्ति अभंगा॥
गोकुल बसी शुचि भक्तन कीन्हा॥
कृष्ण नन्द घर गोकुल आयों।
चरण वन्दि करि दर्शन पायों॥
कोटि काम लाजहि मन मोहें॥
कृष्णवेश नथ मोती राजत।
नुपूर घुंघरू चरण में बाजत॥
मोहनी रूप सब उपमा फिकी॥
मन्द चलहि प्रिय-प्रीतम प्यारी।
रीझहि श्याम प्रिय प्रिया निहारी॥
बिनु प्रीतम क्षण चैन न पावत॥
मुरलीधर जब मुरली बजावैं।
संग केलि कर आनन्द पावैं॥
जलखग कूजत मृदुबानी बोलत॥
जा पर कृपा दृष्टि बरसावें।
प्रेम को भेद सोई जन पावें॥
सबहि अमगंल देखि टरि जावें॥
भजे नाम यमुना अमृत रस।
रहे साँवरो सदा ताहि बस॥
सुर नर मुनि बंदहि सब ज्ञानी॥
भूतल प्रकटी अवतार जब लीन्हो।
उध्दार सभी भक्तन को किन्हो॥
योगी जति मुनी ध्यान लगावत॥
दंड प्रणाम जे आचमन करहि।
नासहि अघ भवसिंधु तरहि॥
देव सकल तेहि भाग्य सरावें॥
करि ब्रज वास निरंतर ध्यावहि।
परमानंद परम पद पावहि॥
नव भक्तिरस निज उर भरहि॥
पूजा नेम चरण अनुरागी।
होई अनुग्रह दरश बड़भागी॥
अन्तर सुख मन निर्मल रहहि॥
कीरति विशद विनय करी गावत।
सिध्दि अलौकिक भक्ति पावत॥
मोहन सन्मुख सुनन को आवें॥
आतुर होय शरणागत आवें।
कृपाकरी ताहि बेगि अपनावें॥
भव पीड़ा हरहि निज जन की॥
शरण प्रतिपाल प्रिय कुंजेश्वरी।
ब्रज उपमा प्रीतम प्राणेश्वरी॥
ब्रह्म सम्बन्ध जीव को होई॥
पुष्टिमार्गी नित महिमा गावैं।
कृष्ण चरण नित भक्ति दृढावैं॥
नमो नमो श्रीपति पटरानी॥
नमो नमो यमुने सुख करनी।
नमो नमो यमुने दुःख हरनी॥
श्रीहरिप्रिया निकुंज निवासिनी॥
करूणामयी अब कृपा कीजैं।
फदंकाटी मोहि शरण मे लीजैं॥
कृपा प्रसाद ते सब सुख पावैं॥
ज्ञान भक्ति धन कीर्ति पावहि।
अंत समय श्रीधाम ते जावहि॥
भक्ति पाई आनंद रमन, कृपा दृष्टि ब्रज वास॥
कृष्ण चरण रति भक्ति दृढ, भव बाधा मिट जाय॥
