चालीसा वर्णन करत, कवि अरु भक्त उदार॥
इनकी सेवा से सदा, मिटते पाप महान।
तट पर कर जप दान नर, पाते हैं नित ज्ञान॥
तुम्हरी महिमा सब जग जानी॥
अमरकण्ठ से निकलीं माता।
सर्व सिद्धि नव निधि की दाता॥
जब प्रकटीं नर्मदा भवानी॥
सप्तमी सूर्य मकर रविवारा।
अश्वनी माघ मास अवतारा॥
कमल पुष्प पर आप विराजैं॥
ब्रह्मा हरि हर तुमको ध्यावैं।
तब ही मनवांछित फल पावैं॥
कोटि भक्त गण नित्य नहाते॥
जो नर तुमको नित ही ध्यावै।
वह नर रुद्र लोक को जावैं॥
अन्तिम समय परमपद पावैं॥
मस्तक मुकुट सदा ही साजैं।
पांव पैंजनी नित ही राजैं॥
पाप ताप हरती हो माता॥
पूरब से पश्चिम की ओरा।
बहतीं माता नाचत मोरा॥
सूत आदि तुम्हरौ यश गावै॥
शिव गणेश भी तेरे गुण गावैं।
सकल देव गण तुमको ध्यावैं॥
ये सब कहलाते दुःख हारे॥
मनोकामना पूरण करती।
सर्व दुःख माँ नित ही हरतीं॥
कुरुक्षेत्र में सरस्वती महिमा॥
पर नर्मदा ग्राम जंगल में।
नित रहती माता मंगल में॥
तरत पीढ़ी है नर नारा॥
मेकल कन्या तुम ही रेवा।
तुम्हरी भजन करें नित देवा॥
तुमने कोटि जनों को तारा॥
समोद्भवा नर्मदा तुम हो।
पाप मोचनी रेवा तुम हो॥
करत न बनती मातु बड़ाई॥
जल प्रताप तुममें अति माता।
जो रमणीय तथा सुख दाता॥
महिमा अति अपार है तुम्हारी॥
तुम में पड़ी अस्थि भी भारी।
छुवत पाषाण होत वर वारी॥
सात दिनों में वह फल पाता॥
सरसुति तीन दिनों में देतीं।
गंगा तुरत बाद ही देतीं॥
मानव फल पाता मन भर के॥
तुम्हरी महिमा है अति भारी।
जिसको गाते हैं नर-नारी॥
रुद्र लोक मे पूजा जाते॥
जड़ी बूटियां तट पर राजें।
मोहक दृश्य सदा ही साजें॥
जो हरती नर तन की पीरा॥
घाट-घाट की महिमा भारी।
कवि भी गा नहिं सकते सारी॥
और सहारा नहीं मम दूजा॥
हो प्रसन्न ऊपर मम माता।
तुम ही मातु मोक्ष की दाता॥
उसका मान सदा ही बढ़ता॥
जो शत बार इसे है गाता।
वह विद्या धन दौलत पाता॥
पूरण मनोकामना होई॥
सबके उर में बसत नर्मदा।
यहां वहां सर्वत्र नर्मदा॥
माता जी की कृपा से, दूर होत सन्ताप॥
