सत चित आनंद शिव सुन्दरकी॥
सुर-मुनि-रक्षक दैत्य-निकन्दन,
अनुगत-भक्त भक्त-उर-चन्दन,
मर्यादा-पुरुषोत्तम वरकी॥
सकल लोक-वन्दित विविधन विधि,
हरण शोक-भय, दायक सब सिधि,
मायारहित दिव्य नर-वरकी॥
अखिल लोक पालक त्रिलोक गति,
विश्ववन्द्य अनवद्य अमित-मति,
एकमात्र गति सचराचरकी॥
भक्त कल्पतरु-वर असुरारी,
नाम लेत जग पावनकारी,
वानर-सखा दीन-दुख-हारी॥
