जय जय जय बुध देव जी, शरण तुम्हारी आता॥
बुध ग्रह दोष निवारणा, विघ्न हरण सुखकार।
चन्द्र सुत रोहिणी-नन्दन, करहुं भक्त उद्धार॥
जय जय जय बुध देव विधाता॥
तुम हो प्रभु चन्द्र के नन्दन।
रोहिणी सुत हो देव निरंजन॥
रूप देखि सुर नर मुनि मोहे॥
ज्योतिष शास्त्र के तुम हो स्वामी।
अन्तर्यामी हो गुणधामी॥
गले सुशोभित मुक्ता-माला॥
मस्तक तिलक सोहे सुहावन।
दर्शन कर होते हैं पावन॥
हरित वस्त्र मन मोहन दर्शन॥
हरी मूंग दूर्वा प्रिय तुमको।
चंदन अक्षत अर्पण हमको॥
मनवांछित फल पाते हैं॥
बुद्धिहीन को बुद्धि देते।
निर्धन को तुम धन दे देते॥
व्यापार में वह लाभ पावे॥
विद्यार्थी जो पाठ करे।
परीक्षा में वह पार तरे॥
तेरा ध्यान धरे सुध जावे॥
बुधवार जो व्रत है करता।
उसके दुःख प्रभु तुम हो हरता॥
बुध देव का आशीष लेवे॥
सोम पुत्र सौम्य गुण खानी।
बोध विचार पटु बुध वाणी॥
करते दूर सभी दुःख काली॥
जन्म कुण्डली जहाँ विराजे।
उस भाव का शुभ फल बाजे॥
जो भक्त ध्यान धर पाठ कराये॥
संकट टलें दोष सब हारें।
बुध देव भक्तन को उबारें॥
भक्तों के हो भाग्य सितारे॥
शिक्षा ज्ञान बुद्धि के दाता।
ग्रह दोष हरो हो जगत-त्राता॥
बुध देव की महिमा गावें॥
जो यह चालीसा नित गाये।
बुध देव की कृपा वह पाये॥
करहुं भक्त को मालामाला॥
बुध चालीसा जो नित पढ़े।
ज्ञान-बुद्धि-धन सदा बढ़े॥
उसकी बुद्धि बढ़े सदा, सब दुःख दूर हो जाय॥
सोम-नन्दन बुध देव जी, करहुं कृपा अपार।
विद्या बुद्धि धन-यश दो, उतरे भव से पार॥
