शरण पडू में चरण में जोडू दोनों हाथ॥
नमो नमो जगदम्ब भवानी॥
सब जग की हो भाग्य विधाता।
आदि शक्ति तू सबकी माता॥
महिमा अपरम्पार तुम्हारी॥
शोभा सदन सकल गुणखानी।
वैद पूराणन माँही बखानी॥
शत प्रणाम कालीसिल वाली॥
ज्वालाजी में ज्योति तुम्हारी।
हिंगलाज में तू महतारी॥
तू चामुंडा तू कंकाली॥
नगर कोट में तू ही विराजे।
विंध्यांचल में तू ही राजै॥
वैष्णवदेवी जग विख्याता॥
नव दुर्गा तू मात भवानी।
चामुंडा मंशा कल्याणी॥
जय काली कलकत्ते वाली॥
तू ही लक्ष्मी तू ही ब्रम्हाणी।
पार्वती तू ही इन्द्राणी॥
तू ही है संतोषी माता॥
अन्नपुर्णा तू जग पालक।
मात पिता तू ही हम बालक॥
तारा मतंग्डिंग गायत्री॥
तू ही आदि सुंदरी अम्बा।
मात चर्चिका हे जगदम्बा॥
दूजे हाथ त्रिशूल विराजै॥
काली सिल पै दानव मारे।
राजा नल के कारज सारे॥
महिषासुर को मारनवारी॥
रक्तबीज रण बीच पछारो।
शंखा सुर तैने संहारो॥
करती माता सिंह सवारी॥
ध्वजा तेरी ऊपर फहरावे।
तीन लोक में यश फैलावे॥
चाँदी के चौतरा विराजै॥
लांगुर घटूअन चलै भवन में।
मात राज तेरौ त्रिभुवन में॥
ब्रह्मा विष्णु देव सब ध्यावत॥
अगनित दीप जले मंदिर में।
ज्योति जले तेरी घर – घर में॥
बामन भैरों अस्तुति गावत॥
देव दनुज गन्धर्व व् किन्नर।
भुत पिशाच नाग नारी नर॥
रात दिन तेरे गुण गावे॥
जो तेरा बोले जैकारा।
होय मात उसका निस्तारा॥
जात लगा जो तोंकू परसै॥
ध्वजा नारियल भेंट चढ़ावे।
गुंगर लौंग सो ज्योति जलावै॥
रोली मेहंदी फूल चढ़ावे॥
जो लांगुरिया गोद खिलावै।
धन बल विध्या बुद्धि पावै॥
चाँदी को सिर छत्र धरावै॥
जीवन भर सारे सुख पावै।
यश गौरव दुनिया में छावै॥
भुत प्रेत न वाय सतावै॥
जो कैला चालीसा पड़ता।
नित्य नियम से इसे सुमरता॥
दुःख दारिद्र नष्ट हो जाता॥
गोविन्द शिशु है शरण तुम्हारी।
रक्षा कर कैला महतारी॥
पौष सुदी दौज शुभ पूर्ण भयो यह कार॥
