होइ प्रसन्न सत करहु माँ, जो मैं कहौं बखानि॥
दात्री सब सुख सिद्धि भवानी॥
कामरुप है वास तुम्हारो।
जहँ ते मन नहिं टरत है टारो॥
पुरवहु सदा भगत मन आसा॥
ऋद्धि सिद्धि तुरतै मिलि जाई।
जो जन ध्यान धरै मनलाई॥
हदय बीच याही अवगाहे॥
प्रेम सहित पंडित बुलवावे।
शुभ मुहूर्त निश्चित विचारवे॥
यात्रा विधान करे निश्चय धर॥
पूजन गौरि गणेश करावे।
नान्दीमुख भी श्राद्ध जिमावे॥
गुरु अरु शुक्र उचित रहने पर॥
जब सब ग्रह होवें अनुकूला।
गुरु पितु मातु आदि सब हूला॥
आशीर्वाद जब उनसे पावे॥
सबहिं प्रकार शकुन शुभ होई।
यात्रा तबहिं करे सुख होई॥
मंत्र लेइ देवी कहँ जाई॥
आदर पूर्वक गुरु बुलावे।
मन्त्र लेन हित दिन ठहरावे॥
प्रसन्न होई दक्षिणा देवै॥
ॐ का नमः करे उच्चारण।
मातृका न्यास करे सिर धारण॥
माँ कामाक्षा धर उर लाई॥
देवी मन्त्र करे मन सुमिरन।
सन्मुख मुद्रा करे प्रदर्शन॥
मन चाहत वर देवे आनी॥
जबहिं भगत दीक्षित होइ जाई।
दान देय ऋत्विज कहँ जाई॥
विप्र नारि कन्या जिमवावे॥
दीन अनाथ दरिद्र बुलावे।
धन की कृपणता नहीं दिखावे॥
गुरु मन्त्र नित जप कर सोवे॥
देवी चरण का बने पुजारी।
एहि ते धरम न है कोई भारी॥
जो देवी का ध्यान लगावे॥
तू ही दुर्गा तू ही काली।
माँग में सोहे मातु के लाली॥
मातु के सोहैं सिर पर मौरी॥
क्षुधा, दुरत्यया, निद्रा तृष्णा।
तन का रंग है मातु का कृष्णा॥
मातु अँगुलिया में है मुंदरी॥
कालरात्रि वेदगर्भा धीश्वरि।
कंठमाल माता ने ले धरि॥
देह तजी जानु रही नश्वरा॥
स्वरा महा श्री चण्डी।
मातु न जाना जो रहे पाखण्डी॥
शिवजी की ओ रहीं भार्या॥
पद्मा, कमला, लक्ष्मी, शिवा।
तेज मातु तन जैसे दिवा॥
पुर हिं भगतन की अभिलाषा॥
रजस्वला जब रुप दिखावे।
देवता सकल पर्वतहिं जावें॥
जब लग होइ न तेज प्रकाशा॥
एहि ते सिद्ध पीठ कहलाई।
जउन चहै जन सो होई जाई॥
सब सुख भोग देवि पद पावे॥
होहिं प्रसन्न महेश भवानी।
कृपा करहु निज-जन असवानी॥
जग हित माँ प्रगटत भई, सके न कोऊ खानि॥
