श्याम चालीसा भणत हूँ, रच चैपाई छन्द॥
सहज ही हो भवसागर पारा॥
दीन दयालु न दाता होई॥
कहीं भीम का पौत्र कहाया॥
तनिक न मानों इसमें अन्तर॥
भक्तन हेतु मनुज तनु धारा॥
यशुमति मैया नन्द दुलारे॥
बृजकिशोर गोवर्धन धारी॥
दीनपाल श्री बाल मुकुन्दा॥
नाथ द्वारिकाधीश खरारी॥
खम्भ फारि हिरनाकुश मारा॥
गोपी वल्लभ कंस हनंता॥
माखन चोरि चोरि कर खाये॥
कृष्ण पतितपावन अभिरामा॥
पुरुषोत्तम केशव जगदीशा॥
दीन बन्धु भक्तन रखवारा॥
शेष महेश थके मुनिराया॥
श्याम श्याम सब रटत निरन्तर॥
नाम अपार अथाह अनन्ता॥
ले अवतार भक्त सुखदाई॥
श्याम भजे तो हो निस्तारा॥
भीलनी की भक्ति बलिहारी॥
भई श्राप वश शिला दुखारी॥
पहुँची पतिलोक में जाई॥
नाम प्रताप परम गति पाई॥
सुख लहहि दुःख दूर हो सारा॥
मोर मुकुट सिर तन पीताम्बर॥
छवि अनूप भक्तन मन भाई॥
शाम दुपहरि अरू परभाती॥
रोड़े दूर होय उस पथ के॥
भीर परि तब श्याम पुकारा॥
जी ले श्याम नाम के हाले॥
अन्त श्याम सुख योग मिलेगा॥
मन के गोरे भोले भाले॥
रोग दोष अघ नाशै भारी॥
भक्त लगत श्याम को प्यारा॥
पार ब्रह्म पूरण अविनासी॥
चहुं दिशि नाना जहाँ सुनि पाई॥
मुग्ध भये सुनि वंशी के स्वर॥
खाटू में जहाँ श्याम कन्हाई॥
भव भय से पाया छुटकारा॥
इच्छा पूर्ण भक्त की, करो न लाओ बार॥
