नमो नमो हरि प्रेयसी, श्री वृन्दा गुन खानी॥
जनहित हे वृन्दावनी, अब न करहु विलम्ब॥
महिमा अगम सदा श्रुति गाता॥
हरीहीँ हेतु कीन्हो तप भारी॥
तब कर जोरी विनय उस कीन्ह्यो॥
दीन जानी जनि छाडाहू छोहु॥
दीन्हो श्राप कध पर आनी॥
होहू विटप तुम जड़ तनु धारी॥
करहु वास तुहू नीचन धामा॥
सुनहु सुमुखी जनि होहू बिहाला॥
पुजिहौ आस वचन सत मोरा॥
तासु भई तुलसी तू बामा॥
राधे शक्यो प्रेम लखी नाही॥
नर लोकही तुम जन्महु बाला॥
शङ्ख चुड नामक शिर ताजा॥
परम सती गुण रूप अगारी॥
कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ॥
असुर जलन्धर नाम पति को॥
लीन्हा शंकर से संग्राम॥
मरही न तब हर हरिही पुकारे॥
कोऊ न सके पतिहि संहारी॥
वृन्दा ढिग हरि पहुच्यो जाई॥
कियो सतीत्व धर्म तोही भंगा॥
सुनी उर शोक उपारा॥
लखी वृन्दा दुःख गिरा उचारी॥
सोई रावन तस हरिही सीता॥
धर्म खण्डी मम पतिहि संहारा॥
होवे तनु पाषाण तुम्हारा॥
दियो श्राप बिना विचारे॥
छलन चह्यो जब पारवती को॥
जग मह तुलसी विटप अनूपा॥
नदी गण्डकी बीच ललामा॥
सब सुख भोगी परम पद पईहै॥
अतिशय उठत शीश उर पीरा॥
सो सहस्र घट अमृत डारत॥
रोग दोष दुःख भंजनी हारी॥
तुलसी राधा में नाही अन्तर॥
बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा॥
लहत मुक्ति जन संशय नाही॥
तुलसिहि निकट सहसगुण पावत॥
जो प्रयास ते पूर्व ललामा॥
होही सुख भाषहि त्रिपुरारी॥
दीपदान करि पुत्र फल, पावही बन्ध्यहु नारी॥
आशिय धन जन लड़हि, ग्रह बसही पूर्णा अत्र॥
जेई दल अर्पही तुलसी तंह, सहस बसही हरीराम॥
मानस चालीस रच्यो, जग महं तुलसीदास॥
