नंदी भृंगी नृत्य करत हैं,
धरत ध्यान सुर सुखरासी॥
जय कैलासवासी...॥
बैठे हैं शिव अविनाशी।
करत गान गंधर्व सप्त स्वर,
राग रागिनी मधुरासी॥
जय कैलासवासी...॥
बोलत हैं बनके वासी।
कोयल शब्द सुनावत सुन्दर,
भ्रमर करत हैं गुंजा-सी॥
जय कैलासवासी...॥
लाग रहे हैं लक्षासी।
कामधेनु कोटिन जहाँ डोलत,
करत दुग्धकी वर्षा-सी॥
जय कैलासवासी...॥
चन्द्रकान्त सम हिमराशी।
नित्य छहों ऋतु रहत सुशोभित,
सेवत सदा प्रकृति-दासी॥
जय कैलासवासी...॥
गान करत श्रुति गुणराशी।
ब्रह्मा-विष्णु निहारत निसिदिन,
कछु शिव हमकूँ फरमासी॥
जय कैलासवासी...॥
नित सत् चित आनँदराशी।
जिनके सुमिरत ही कट जाती,
कठिन काल-यमकी फाँसी॥
जय कैलासवासी...॥
प्रेम सहित जो नर गासी।
दूर होय बिपदा उस नर की,
जन्म-जन्म शिवपद पासी॥
जय कैलासवासी...॥
अविनाशी मेरी सुध लीजो।
सेवक जान सदा चरननको,
अपनों जान कृपा कीजो॥
जय कैलासवासी...॥
अवगुण मेरे सब ढकियो।
सब अपराध क्षमाकर शंकर,
किंकरकी बिनती सुनियो॥
जय कैलासवासी...॥
