अमर उडेरो लाल जय, झुलेलाल अनूप॥
जयति देवकी सुत जग वंदन॥
दरियाशाह वरुण अवतारी।
जय जय लाल साईं सुखकारी॥
जिन्दा पीर हरे जन पीरा॥
संवत दस सौ सात मंझरा।
चैत्र शुक्ल द्वितिया भगऊ वारा॥
प्रभु अवतरे हरे जन कलेशा॥
सिन्धु वीर ठट्ठा राजधानी।
मिरखशाह नऊप अति अभिमानी॥
यवन मलिन मन अत्याचारी॥
धर्मान्तरण करे सब केरा।
दुखी हुए जन कष्ट घनेरा॥
हो इस्लाम धर्म चाहुँओरा॥
सिन्धी प्रजा बहुत घबराई।
इष्ट देव को टेर लगाई॥
बिन जल अन्न गए दिन राती॥
सिन्धी तीर सब दिन चालीसा।
घर घर ध्यान लगाये ईशा॥
चारो और उठा नव हरषा॥
वरुणदेव ने सुनी पुकारा।
प्रकटे वरुण मीन असवारा॥
कर पुष्तक नवरूप अनूपा॥
हर्षित हुए सकल नर नारी।
वरुणदेव की महिमा न्यारी॥
गई रात आने को भौंरा॥
मिरखशाह नऊप अत्याचारी।
नष्ट करूँगा शक्ति सारी॥
शीघ्र नसरपुर में अवतारा॥
रतनराय रातनाणी आँगन।
खेलूँगा, आऊँगा शिशु बन॥
झुलेलाल अवतारे सब देय बधाई॥
घर घर मंगल गीत सुहाए।
झुलेलाल हरन दुःख आए॥
भेजा मंत्री क्रोध अधिकाई॥
मंत्री ने जब बाल निहारा।
धीरज गया हृदय का सारा॥
अधिक विचित्र विमोहन शीला॥
बालक धीखा युवा सेनानी।
देखा मंत्री बुद्धि चाकरानी॥
मंत्री हुआ विगत अभिमाना॥
झुलेलाल दिया आदेशा।
जा तव नऊपति कहो संदेशा॥
हिन्दू मुस्लिम एक समाना॥
बंद करो नित्य अत्याचारा।
त्यागो धर्मान्तरण विचारा॥
वरुणदेव की बात न मानी॥
एक दिवस हो अश्व सवारा।
झुलेलाल गए दरबारा॥
झुलेलाल बनाओ बन्दी॥
किया स्वरुप वरुण का धारण।
चारो और हुआ जल प्लावन॥
नऊप के होश ठिकाने आये॥
नऊप तब पड़ा चरण में आई।
जय जय धन्य जय साईं॥
दूर दूर सब जन क्लेशा॥
संवत दस सौ बीस मंझारी।
भाद्र शुक्ल चौदस शुभकारी॥
जल में ली जलदेव समाधि॥
जो जन धरे आज भी ध्याना।
उनका वरुण करे कल्याणा॥
पावे मनवांछित फल अरु जीवन सुखमय होय॥
