हृदय से सिमरन करूं दो भक्ति वरदान॥
सुख वैभव सब दीजिए बनूं तिहारा दास।
दया दृष्टि करो भगवती आपमें है विश्वास॥
दीन दुखी की भाग्य विधाता॥
ज्योति आपकी जगमग जागे।
दर्शन कर अंधियारा भागे॥
चौदह भुवन में दो उजियारा॥
ब्रह्मा विष्णु शंकर द्वारे।
जै मां जै मां सभी उच्चारे॥
मंदिर जग में सबसे न्यारा॥
काली लक्ष्मी सरस्वती मां।
एक रूप हो पार्वती मां॥
आ गणेश जी मंगल गावें॥
गौरी कुंड में आन नहाऊं।
मन का सारा मैल हटाऊं॥
बाबा बालक नाथ मनाऊं॥
आपकी लीला अमर कहानी।
वर्णन कैसे करें ये प्राणी॥
कंखल हरिद्वार सजाया॥
शंकर का अपमान कराया।
पार्वती ने क्रोध दिखाया॥
सारा यज्ञ विध्वंस कराया॥
कूद गई माँ कुंड में जाकर।
शिव भोले से ध्यान लगाया॥
नाथ जी बहुत क्रोध कर॥
विष्णु जी सब जान के माया।
चक्र चलाकर बोझ हटाया॥
बन गए मां के मंदिर उस पर॥
कोप किया दश कन्ध पे भारी।
कुटम्ब संहारा सेना भारी॥
जिन्हें पूजते हैं हम जा के॥
जिह्वा गिरी कांगड़े ऊपर।
अमर तेज एक प्रगटा आकर॥
अनसुइया गैया वहां निकली॥
दूध पिया मां रूप में आके।
घबराया ग्वाला वहां जाके॥
पाया उसने वहींं ठिकाना॥
सारा भेद राजा को बताया।
ज्वालाजी मंदिर बनवाया॥
हलवे चने का भोग लगाया॥
कलयुग वासी पूजन कीना।
मुक्ति का फल सबको दीना॥
बावन भैरों हैं मतवारे॥
ज्योति को प्रसाद चढ़ावें।
पेड़े दूध का भोग लगावें॥
डमरू छैने गाएं बधाई॥
तुगलक अकबर ने आजमाया।
ज्योति कोई बुझा नहीं पाया॥
ज्योति पर पानी भी गिराया॥
लोहे की चादर थी ठुकवाई।
जोत फैलकर जगमग आई॥
छत्र चढ़ाने दर पर आया॥
शरणागत को मां अपनाया।
उसका जीवन धन्य बनाया॥
मांगूं मां झोली फैलाकर॥
मुझको मां विपदा ने घेरा।
काम क्रोध ने लगाया डेरा॥
बार-बार मैं शीश नवाऊं॥
जै जै जै जगदम्ब ज्वालपा।
ध्यान रखेगी तू ही बालका॥
उसका जीवन धन्य बनाया॥
कलिकाल में तुम वरदानी।
क्षमा करो मेरी नादानी॥
शरण पड़े को गले लगाओ।
ज्योति रूप में सन्मुख आओ॥
“ओम” को दर प्यारा लगे तुम्हारा ही विश्वास॥
