तुम हो जगत के पालनकर्ता, भक्तों के हो तुम दुःखहर्ता॥
स्वामी कार्तिकेय अगम अपारा॥
शिव सुत, उमा लाल, षडानन,
सनमुख, शूलपाणि, शरजनन॥
कलि-कलुष, दुःख, दारिद्रय निकंदन॥
देवों के सेनापति स्वामी,
तारकासुर के अरि, नमामि॥
इसीसे कार्तिकेय कहाये॥
रूप अनुपम, गुणगान वरिष्ठा,
छः मुख सोहत, अंग सुनिष्ठा॥
भक्त हेतु तुम हो प्रतिपाला॥
ब्रह्मचारी, व्रतधारी स्वामी,
परम तपस्वी, अन्तर्यामी॥
करते सुर-नर-मुनि सब सेवा॥
तारक ने जब त्रास मचाया,
स्वर्गलोक पर चँवर ढुलाया॥
भागे-भागे शरण तुम्हारी॥
तब तुमने निज शक्ति दिखाई,
तारक का वध तुरत मचाई॥
तब उमा ने हृदय लगाया॥
नाम तुम्हारा है शरवणभव,
भवसागर के तुम हो उद्भव॥
भक्तों के तुम हो रखवारे॥
कुमार, गुह, गंगासुत देवा,
तुम ही हो शिव-पार्वती सेवा॥
असुर-दल काँपे थरथारी॥
रोग-दोष, अरु दारिद्र सारा,
भक्त-जनों का हरते भारा॥
वह मनवांछित फल को पावे॥
जो नर जपता नाम तुम्हारा,
हो जाता भवसागर पारा॥
नाम जपे, होए भय निर्मूल॥
जो हैं निर्धन, दीन-दुखारी,
तुम करते उनकी प्रतिपाली॥
निश्चय ही वह पुत्र को पावे॥
भूत-प्रेत अरु दुष्ट पिशाचा,
नाम सुने भागे सब साचा॥
उसपर कृपा करें गौरीसा॥
प्रतिदिन इसे जो मन लाए पढ़ेगा,
उसका सब दुःख दूर हटेगा॥
घर में सुख-समृद्धि आवे॥
कार्तिक मास जो पाठ करावे,
सब संकट से तुरत बचावे॥
ताको मिले सकल सुखराई॥
स्वामी शक्ति-धर, गणनायक,
तुम हो मेरे सदा सहायक॥
हर लो मेरी विपत्ति सारी॥
हे जगपालक, हे जगवंदन,
करूँ मैं नित्य तुम्हारा वंदन॥
तुम बिन कोई नहीं मेरा हित॥
मैं हूँ शरण तुम्हारी देवा,
स्वीकार करो यह मेरी सेवा॥
मेटो मेरे दुःख के बंधन॥
जय जय जय स्वामी कार्तिकेय,
हर-हर-हर-हर उमा के प्रिय॥
मिले उसे सुख-शान्ति अरु, भक्ति का वरदान॥
