Lord Subrahmanya

श्री कार्तिकेय चालीसा

(Sri Kartikeya Calisa)

Also known as shree kartikeya chalisa · shri kartikeya calisa · shree kartikeya calisa

A Hindi chalisa to Kartikeya which spends its opening verses on the fact that he has more parents than anyone else and gives each of them a line. He is Shiva's son and Uma's boy; the beloved of Gauri and the delight of Ganga; and then the verse that explains the name the chalisa is titled with — you are called the son of the Krittikas, and from that you came to be called Kartikeya. Six-faced, spear in hand, born in the reed thicket, commander of the armies of the gods, and the enemy of Tarakasura, which is the reason he was born at all. What it asks him for is the ordinary business of a chalisa, the ending of the taint of the Kali age and of poverty and sorrow, and it addresses him throughout by the northern name rather than by the southern ones.

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Script: Devanagari (देवनागरी) — also the script of Hindi, Marathi, Nepali and Konkani.

॥ दोहा ॥
जय जय सब देवन के देवा, करें सदा तुम्हरे पद सेवा।
तुम हो जगत के पालनकर्ता, भक्तों के हो तुम दुःखहर्ता॥
॥ चौपाई ॥
जयति जयति श्री स्कन्द कुमारा,
स्वामी कार्तिकेय अगम अपारा॥
शिव सुत, उमा लाल, षडानन,
सनमुख, शूलपाणि, शरजनन॥
गौरी प्रिय, गंगा के नंदन,
कलि-कलुष, दुःख, दारिद्रय निकंदन॥
देवों के सेनापति स्वामी,
तारकासुर के अरि, नमामि॥
कृत्तिकाओं के तुम सुत कहलाये,
इसीसे कार्तिकेय कहाये॥
रूप अनुपम, गुणगान वरिष्ठा,
छः मुख सोहत, अंग सुनिष्ठा॥
मोर सवारी, शस्त्र कराला,
भक्त हेतु तुम हो प्रतिपाला॥
ब्रह्मचारी, व्रतधारी स्वामी,
परम तपस्वी, अन्तर्यामी॥
देवन के दुःखहर्ता देवा,
करते सुर-नर-मुनि सब सेवा॥
तारक ने जब त्रास मचाया,
स्वर्गलोक पर चँवर ढुलाया॥
देवगण सब भए दुखारी,
भागे-भागे शरण तुम्हारी॥
तब तुमने निज शक्ति दिखाई,
तारक का वध तुरत मचाई॥
षण्मुख कहकर मात पुकारा,
तब उमा ने हृदय लगाया॥
नाम तुम्हारा है शरवणभव,
भवसागर के तुम हो उद्भव॥
गजानन के भ्राता प्यारे,
भक्तों के तुम हो रखवारे॥
कुमार, गुह, गंगासुत देवा,
तुम ही हो शिव-पार्वती सेवा॥
तेज तुम्हारा है अति भारी,
असुर-दल काँपे थरथारी॥
रोग-दोष, अरु दारिद्र सारा,
भक्त-जनों का हरते भारा॥
जो कोई तुमको मन से ध्यावे,
वह मनवांछित फल को पावे॥
जो नर जपता नाम तुम्हारा,
हो जाता भवसागर पारा॥
शत्रु-भय से जो है व्याकुल,
नाम जपे, होए भय निर्मूल॥
जो हैं निर्धन, दीन-दुखारी,
तुम करते उनकी प्रतिपाली॥
पुत्र-हीन जो तुमको ध्यावे,
निश्चय ही वह पुत्र को पावे॥
भूत-प्रेत अरु दुष्ट पिशाचा,
नाम सुने भागे सब साचा॥
जो नर पढ़ता यह चालीसा,
उसपर कृपा करें गौरीसा॥
प्रतिदिन इसे जो मन लाए पढ़ेगा,
उसका सब दुःख दूर हटेगा॥
ज्ञान-बुद्धि अरु बल बढ़ जावे,
घर में सुख-समृद्धि आवे॥
कार्तिक मास जो पाठ करावे,
सब संकट से तुरत बचावे॥
जो यह सुने भक्ति चित लाई,
ताको मिले सकल सुखराई॥
स्वामी शक्ति-धर, गणनायक,
तुम हो मेरे सदा सहायक॥
मैं हूँ दीन, मलीन, दुखारी,
हर लो मेरी विपत्ति सारी॥
हे जगपालक, हे जगवंदन,
करूँ मैं नित्य तुम्हारा वंदन॥
मुझपर कृपा करो, शरणागत,
तुम बिन कोई नहीं मेरा हित॥
मैं हूँ शरण तुम्हारी देवा,
स्वीकार करो यह मेरी सेवा॥
हे षडानन, हे शिवनंदन,
मेटो मेरे दुःख के बंधन॥
जय जय जय स्वामी कार्तिकेय,
हर-हर-हर-हर उमा के प्रिय॥
॥ दोहा ॥
यह कार्तिकेय चालीसा, पढ़े जो श्रद्धावान।
मिले उसे सुख-शान्ति अरु, भक्ति का वरदान॥

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