Goddess Parvati

श्री संकटा चालीसा

(Shree Sankata Chalisa)

Also known as sankata chalisa · jagata janani jagadambike araja sunahu aba

A Hindi chalisa to Sankata, the goddess named for the trouble she takes away, and it opens on an image much fiercer than that name suggests: sword in hand, brows terrible, red-eyed, a garland of heads at the throat, riding a lion. The middle recounts what she has done rather than what she is — Raktabija killed, Shumbha and Nishumbha's bellies torn open, Mahishasura killed after every god had lost the battle, and the appearing as Kali with an army. The last third turns domestic and sorts its petitions by petitioner: the woman who offers vermilion, those who worship for a son, the poor man, the sick man. Its closing dohas are signed and placed, by Shivdat Mishra of Majhauli village in Deoria district, on the full moon of Margashirsha; he gives his father as Santsharan, which the Baglamukhi Chalisa in this corpus does too.

Read In:

Script: Devanagari (देवनागरी) — also the script of Hindi, Marathi, Nepali and Konkani.

॥ दोहा ॥
जगत जननि जगदम्बिके, अरज सुनहु अब मोर।
बंदौ पद-युग नाइ सिर, विनय करों कर जोर॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय संकटा भवानी,
कृपा करहु मो पर महारानी।
हाथ खड्ग भृकुटि विकराला,
अरुण नयन गल में मुण्डमाला॥
कानन कुण्डल की छवि भारी,
हिय हुलसे मन होत सुखारी।
केहरि वाहन है तव माता,
कष्ट निवारो जन जन त्राता॥
आयऊं शरण तिहारी अम्बे,
अभय करहु मोको जगदम्बे।
शरण आई जो तुमहिं पुकारा,
बिन बिलम्ब तुम ताहि उबारा॥
भीर पड़ी भक्तन पर जब-जब,
किया सहाय मात तुम तब-तब।
रक्तबीज दानव तुम मारे,
शुंभ-निशुंभ के उदर विदारे॥
महिसासुर नृप अति बलबीरा,
मारे मरे न अति रणधीरा।
करि संग्राम सकल सुर हारे,
अस्तुति करी तुम तुमहिं पुकारे॥
प्रगटेउ काली रूप में माता,
सेन सहित तुम ताहि निपाता।
तेहि के बध सब देव हरषे,
नभ दुंदुभी सुमन बहु बरसे॥
रक्षा करहु दीन जन जानी,
जय जय जगदंब भवानी।
सब जीवों की हो प्रतिपालक,
जय जग जननी दनुज कुल घालक॥
सकल सुमन की जीवन दाता,
संकट हरो हमारी माता।
संकट नाशक नाम तुम्हारा,
सुयश तुम्हार सकल संसारा॥
सुर नर नाग असुर मुनि जेते,
गावत गुण गान निश दिन तेते।
योगी निशिवासर तब ध्यावहिं,
तदपि तुम्हार अंत न पावहिं॥
अतुल तेज मुख पर छवि सोहै,
निरखि सकल सुर नर मुनि मोहै।
चरण कमल मैं शीश झुकाऊं,
पाहि पाहि कहि नितहि मनाऊं॥
नेति-नेति कहा वेद बखाना,
शक्ति स्वरुप तुम्हार न जाना।
मैं मूरख किमि कहौं बखानी,
नाम तुम्हारा अनेक भवानी॥
सुमिरत नाम कटै दुःख भारी,
सत्य वात यह वेद उचारी।
नाम तुम्हार लेत जो कोई,
ताकौ भय संकट नहीं होई॥
संकट आय परै जो कबहिं,
नाम लेत बिनसत हैं तबहिं।
प्रेम सहित जो जपे हमेशा,
ताके तन नहि रहे कलेशा॥
शरणगत होई जो जन आवैं,
मनवांछित फल तुरतहि पावै।
रणचंडी वन असुर संहारा,
बंधन काटि कियौ छुटकारा॥
नाम सकल कलि कलुष नसावन,
सुमिरत सिद्ध होय नर पावन।
षोड्श पूजन करे जो कोई,
इच्छित फल पावै नर सोई॥
जो नारी सिंदूर चढ़ावे,
तासु सोहाग अचल हो जावै।
पुत्र हेतु जो पूजा करहिं,
सन्तति-सुख निश्चय सो लहहिं॥
और कामना करे जो कोई,
ताके घर सुख संपत्ति होई।
निर्धन नर जो शरण में आवै,
सो निश्चय धनवान कहावै॥
रोगी रोग मुक्त होइ जावै,
तब चरणन को ध्यान लगावै।
सब सुख खानि तुमारि पूजा,
एहि सम और उपाय न दूजा॥
पार करे संकटा चालीसा,
तेहि पर कृपा करहिं गौरीसा।
पाठ करें अरु सुनै सुनावै,
वाकौ सब संकट मिटि जावे॥
कहां तक महिमा कहौं तुम्हारी,
हरहू बेगि मोहि संकट भारी।
मम कारज सब पूरन किजे,
दीन जनि मोहिं अभय कर दीजे॥
तोहि विनय करूं मैं बारम्बारा,
छमहूँ सकल अपराध हमारा।
॥ दोहा ॥
मातु संकटा नाम तब, संकट हरहु हमार।
होइ प्रसन्न निज दास पर, लीजै मोहिं उबार॥
सन्तशरण को तनय हूँ, शिवदत मिश्र सुनाम।
देवरिया मण्डल बसूँ, धाम मझौली ग्राम॥
रचेउँ चालीसा नाइ सिर, तुम्हरो है अवलम्ब।
मार्गशीर्ष की पूर्णिमा, कृपा करहु जगदम्ब॥

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