ध्यान करिअ नित हिय कमल। प्रणमिअ विनय सभक्ति।
आद्या शक्ति पधान, शाकम्भरी चरण युगल।
प्रणमिअ पुनि करि ध्यान, नील कमल रुचि अति बिमल॥
सकल चराचर जग अविलम्बए।
जयति सृष्टि पालन संहारिणी,
भव सागर दारुण दुःख हारिणी।
सुख सम्पत्ति भव विभव विधाता।
तव पद कमल नमहिं सब देवा,
सकल सुरासुर नर गन्धर्वा।
तूँ वाणी लक्ष्मी रुद्राणी।
नील कमल रूचि परम सुरूपा,
त्रिगुणा त्रिगुणातीत अरूपा।
भगत सुलभ अति पावन अयना।
त्रिवली ललित उदर तनु देहा,
भावुक हृदय सरोज सुगेहा।
सेवक सुखद सुभव्य शरीरा।
अति प्रशस्त धन पीन उरोजा,
मंगल मन्दिर बदन सरोजा।
चतुर्वर्ग फलदायक विमला।
एक हाथ सोहत हर तुष्टी,
दुष्ट निवारण मार्गन मुष्टी।
पालन भगत हरत भव तापा।
एक हाथ शोभत बहु शाका,
पुष्प मूल फल पल्लव पाका।
हरत भगत भय दारुण मोहा।
एहि कारण शाकम्भरी नामा,
जग विख्यात दत सब कामा।
हरत सकल संतन दुःख पंकज।
सकल वेद वन्दित गुण धामा,
निखिल कष्ट हर सुखद सुनामा।
दुर्गा गौरी हिमगिरि जाता।
उमा सती चण्डी जगदम्बा,
काली तारा जग अविलम्बा।
पुत्र कलत्र राज्यसुखं कारिणी।
दुर्गम नाम दैत्य अति दारूण,
हिरण्याक्ष कुलजात अकारुण।
सकल वेद हरी धर्म नशावा।
तब हिमगिरि पहुँचे सब देवा,
लागे करन मातु पद सेवा।
नाना लोचन शोभिनी शंकरि।
दुःखित देखि देवगण माता,
दयामयि हरि सब दुःख जाता।
क्षुधा तृषा हरली सब शोका।
नाम शताक्षी सब जग जाना,
शाकम्भरी अपर अभिघाना।
संकट मे सब लोक उबारो।
किन्हीं तब सुरगण स्तुति-पूजा,
सुत पालिनी माता नहि दूजा।
संकट मोचन जग विख्याता।
एहि विधि जब-जब उपजहिं लोका,
दानव दुष्ट करहि सुर शोका।
पाप विनाशनि खल संहारा।
पालहि विबुध विप्र अरू वेदा,
हरहिं सकल संतन के खेदा।
तब शुभ यश त्रिभुवन विख्याता।
जो कोई सुजस सुनत अरू गाता,
सब कामना तुरंत सो पाता।
प्रणब रूप योगी जन जाना।
नहि तुअ आदि मध्य अरू अन्ता,
मो जानत तुअ चरित्र अनन्ता।
तू सेवत नहिं विपति सताता।
एहि विधि जो तच्च गुण गण जाता,
सो इह सुखी परमपद पाता।
शाकम्भरी चरण युगल, पूजहिं भक्ति अपार॥
जो इह सुख सम्पत्ति लभहि, ज्ञान शक्ति श्रुति सार।
बिनु श्रम तरहिं विवेक लहि, यह दुर्गम संसार॥
कृष्णानन्द अमन्द मुद, सुमति देहु जगदम्ब।
सकल कष्ट हरि तनमन के, कृपा करहु अविलम्ब॥
