वैभवाश्रित पारिजातक पाहि मां परमेश्वर ।
कामितार्थद पादपङ्कज कालकाल जगद्गुरो
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ १ ॥
कार्मुकीकृत शीतगुम्फ धराधरेंद्र जगन्मणे ।
लोचनीकृत शीतरश्मि कृपीटयोनि नभोमणे
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ २ ॥
कल्पितावस कामितार्थ प्रदान गौरनदी तटे ।
व्याल भूषणजाल शोभित व्याघ्रचर्म लसत्कटे
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ३ ॥
वीरवर्य विरिञ्चिसन्नुत वृक्षरूप कलेवर ।
नीतिपेशल मानसाम्बुज नित्यवास महाप्रभो
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ४ ॥
निर्जरद्रुम पुष्पजाल सुगन्धित स्वदिगन्तरे ।
मित्र वह्निशशी मरुज्जल यज्वखावनिकाकृते
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ५ ॥
पालयाखिल वैभवाज कपालभृत् करपङ्कज ।
कालगर्वहरान्ध कान्तक कृत्तिवासक धूर्जटे
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ६ ॥
कोटिजन्म कृताघ संहृति दीक्षिता भवभेषजी ।
तादृगद्भुत कुन्द भूरुह दर्शनाद पवर्गकृत्
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ७ ॥
प्राणनाथ परात्पराच्युत कारणत्रय कारण ।
नादबिन्दु कलास्वरूप सहस्रपत्र निकेतन
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ८ ॥
पावनं परमार्थदं परमात्म नायक सन्निधौ ।
भक्तियुक्त मनाः पठेद्यदि दुर्लभं परमं पदं
प्राप्य निर्वृतिमेत्य शाश्वत एव तत्र वसेदसौ ॥ ९ ॥
