Lord Shiva

श्री परमेश्वर अष्टकम् (पार्वती कृत)

(Shri Parameshvara Ashtakam)

Parvati

Also known as parameshwara ashtakam parvati · parvati krita parameshvarashtakam · pahi mam parameshvara

Eight verses given by their colophon to Parvati — the daughter of the mountain king praising her own husband, which the last verse states outright — and written in a long trochaic metre that keeps four heavy vocatives to a line. Lotus-seated, lotus-eyed, true teacher, unequalled, purifier, wishing tree resorted to by the glorious: protect me, supreme lord. Giver of the wished-for thing, lotus-footed, death of death, teacher of the world; lord of the temple where the jasmine grows, grant me what I long for. The second verse works the same way through the moon at his crest, the mountain bent into a bow, and the cool-rayed one made into an eye. The closing verse promises the hard-won supreme state to whoever reads it with a devoted mind in the presence of the lord.

Read In:

Script: Devanagari (देवनागरी) — also the script of Hindi, Marathi, Nepali and Konkani.

॥ श्री परमेश्वर अष्टकम् ॥
पङ्कजासन पद्मलोचन सद्गुरोऽतुल पावन
वैभवाश्रित पारिजातक पाहि मां परमेश्वर ।
कामितार्थद पादपङ्कज कालकाल जगद्गुरो
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ १ ॥
कारणत्रय मूल बालशशाङ्क खण्ड शिरोमणे
कार्मुकीकृत शीतगुम्फ धराधरेंद्र जगन्मणे ।
लोचनीकृत शीतरश्मि कृपीटयोनि नभोमणे
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ २ ॥
कैटभारि शिलीमुखातुल काश्यपीरथ धूर्जटे
कल्पितावस कामितार्थ प्रदान गौरनदी तटे ।
व्याल भूषणजाल शोभित व्याघ्रचर्म लसत्कटे
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ३ ॥
वीतिहोत्र सुतीर्थ तीरविहार विश्वधुरन्धर
वीरवर्य विरिञ्चिसन्नुत वृक्षरूप कलेवर ।
नीतिपेशल मानसाम्बुज नित्यवास महाप्रभो
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ४ ॥
विध्यदृष्ट सुशीर्ष शोभित विष्ण्वदृश्य पदाम्बुज
निर्जरद्रुम पुष्पजाल सुगन्धित स्वदिगन्तरे ।
मित्र वह्निशशी मरुज्जल यज्वखावनिकाकृते
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ५ ॥
कालनीरद नीलकन्धर शूलपाश धराद्य मां
पालयाखिल वैभवाज कपालभृत् करपङ्कज ।
कालगर्वहरान्ध कान्तक कृत्तिवासक धूर्जटे
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ६ ॥
कुन्द भूरुहमूलमृत् तव जन्म मृत्यु जराधिहा
कोटिजन्म कृताघ संहृति दीक्षिता भवभेषजी ।
तादृगद्भुत कुन्द भूरुह दर्शनाद पवर्गकृत्
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ७ ॥
नामरूप विहीन निर्गुण निष्कलङ्क महामहः
प्राणनाथ परात्पराच्युत कारणत्रय कारण ।
नादबिन्दु कलास्वरूप सहस्रपत्र निकेतन
कुन्द भूरुह मन्दिरेश्वर सन्ददस्व मदीप्सितम् ॥ ८ ॥
॥ फलश्रुति ॥
पर्वतेन्द्र सुताकृतं परमेश्वराष्टक मद्भुतं
पावनं परमार्थदं परमात्म नायक सन्निधौ ।
भक्तियुक्त मनाः पठेद्यदि दुर्लभं परमं पदं
प्राप्य निर्वृतिमेत्य शाश्वत एव तत्र वसेदसौ ॥ ९ ॥
॥ इति पार्वतीकृतं श्री परमेश्वर अष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

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