एह्येहि देवि पद्माक्षि पद्माकरकृतालये ॥ १ ॥
आयाह्यायाहि धर्मार्थकाममोक्षमये शुभे ॥ २ ॥
कनीयसी महाभागा चन्द्रेण परमात्मना ॥ ३ ॥
उत्पन्नमात्रौ तावास्तां शिवकेशवसंश्रितौ ॥ ४ ॥
प्रोक्तवानितिहासं तु लक्ष्म्याः स्तोत्रमनुत्तमम् ॥ ५ ॥
मुक्तिर्भवति लोकेऽस्मिन् दारिद्र्यं याति भस्मताम् ॥ ६ ॥
पूर्वं कृतयुगे ब्रह्मा भगवान् सर्वलोककृत् ।
सृष्टिं नानाविधां कृत्वा पश्चाच्चिन्तामुपेयिवान् ॥ ७ ॥
तथैव चासां दारिद्र्यात्कथमुत्तरणं भवेत् ॥ ८ ॥
क्षीरोदस्योत्तरे कूले जगाम कमलोद्भवः ॥ ९ ॥
ददर्श पुण्डरीकाक्षं वासुदेवं जगद्गुरुम् ॥ १० ॥
सर्वेश्वरं वासुदेवं विष्णुं लक्ष्मीपतिं प्रभुम् ॥ ११ ॥
अनन्तभोगशयनं विश्रान्तं श्रीनिकेतनम् ॥ १२ ॥
योगनिद्रारतं श्रीशं सर्वावासं सुरेश्वरम् ॥ १३ ॥
लक्ष्म्यादिशक्तिकरणं जातमण्डलमण्डितम् ॥ १४ ॥
दुर्निरीक्ष्यं सुरैः सिद्धैर्महायोनिशतैरपि ॥ १५ ॥
प्रबुद्धं देवमीशानं दृष्ट्वा कमलसम्भवः ॥ १६ ॥
मनोवाञ्छितसिद्धिं त्वं पूरयस्व महेश्वर ॥ १७ ॥
नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ॥ १८ ॥
प्रसीद मम भक्तस्य छिन्धि सन्देहजं तमः ॥ १९ ॥
प्रसादाभिमुखः प्राह हरिर्विश्रान्तलोचनः ॥ २० ॥
तद्वक्ष्यामि न सन्देहो भक्तोऽसि मम सुव्रत ॥ २१ ॥
प्रत्युवाचमहाबुद्धिर्भगवन्तं जनार्दनम् ॥ २२ ॥
परित्राणाय मे ब्रूहि रहस्यं परमाद्भुतम् ॥ २३ ॥
सर्वेश्वर महाबुद्धे स्वरूपं भैरवं महत् ॥ २४ ॥
नामानि चैव मुख्यानि यानि गौणानि चाच्युत ॥ २५ ॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रतिवाक्यमुवाच सः ॥ २६ ॥
भगवद्वासुदेवस्य नित्यं चैषाऽनपायिनी ॥ २७ ॥
सर्वशक्त्यात्मिका चैव विश्वं व्याप्य व्यवस्थिता ॥ २८ ॥
प्राणशक्तिः परा ह्येषा सर्वेषां प्राणिनां भुवि ॥ २९ ॥
अहं तस्याः परं नाम्नां सहस्रमिदमुत्तमम् ॥ ३० ॥
देव्याख्यास्मृतिमात्रेण दारिद्र्यं याति भस्मताम् ॥ ३१ ॥
केवला निष्कला शुद्धा व्यापिनी व्योमविग्रहा ॥ ३२ ॥
निर्व्योमा व्योममध्यस्था पञ्चव्योमपदाश्रिता ॥ ३३ ॥
नित्यशुद्धा नित्यतृप्ता निर्विकारा निरीक्षणा ॥ ३४ ॥
स्नेहाभासा निरानन्दा विभूतिर्विमला चला ॥ ३५ ॥
शक्तिर्विभिन्नसर्वार्तिः समुद्रपरितोषिणी ॥ ३६ ॥
ज्ञानज्ञेया ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेयविकासिनी ॥ ३७ ॥
स्वरूपा सर्वगाऽपारा बृंहिणी सुगुणोर्जिता ॥ ३८ ॥
असङ्कीर्णा सुशान्ता च शाश्वती भासुरी स्थिरा ॥ ३९ ॥
अभेद्या भेदिनी भिन्ना भारती वैखरी खगा ॥ ४० ॥
अनिर्देश्याऽप्रतिहता निर्बीजा पावनी परा ॥ ४१ ॥
एका द्विरूपा त्रिविधा असङ्ख्याता सुरेश्वरी ॥ ४२ ॥
ईश्वरी महिमा ऋद्धिः प्रमोदा उज्ज्वलोद्यमा ॥ ४३ ॥
नीरजा जननी नित्या जया रोचिष्मती शुभा ॥ ४४ ॥
अप्रमेया त्रिधा सूक्ष्मा परा निर्वाणदायिनी ॥ ४५ ॥
सन्धानकी शुद्धविद्या सर्वभूतमहेश्वरी ॥ ४६ ॥
अनुग्रहाशक्तिराद्या जगज्ज्येष्ठा जगद्विधिः ॥ ४७ ॥
सम्पूर्णाह्लादिनी शुद्धा ज्योतिष्मत्यमतावहा ॥ ४८ ॥
परा वसुमती देवी कान्तिः शान्तिर्मतिः कला ॥ ४९ ॥
सम्बोधिनी हारिणी च प्रभावा भवभूतिदा ॥ ५० ॥
धूमा कलावती पूर्णा भासुरा सुमती रसा ॥ ५१ ॥
प्रापणी प्राणदा प्रह्वा विश्वा पाण्डुरवासिनी ॥ ५२ ॥
अनन्तरूपाऽनन्तात्माऽनन्तस्थाऽनन्तसम्भवा ॥ ५३ ॥
महासमूहा निखिला इच्छाधारा सुखावहा ॥ ५४ ॥
नानादेहा महावर्ता बहुदेहविकासिनी ॥ ५५ ॥
सर्वाभिलाषपूर्णेच्छा सर्वा सर्वार्थभाषिणी ॥ ५६ ॥
व्यक्ताऽव्यक्ता जीवकेशा सर्वेच्छापरिपूरिता ॥ ५७ ॥
भूतरूपा चित्स्वरूपा त्रिगुणा गुणगर्विता ॥ ५८ ॥
कल्याणवाहिका कल्या कलिकल्मषनाशिनी ॥ ५९ ॥
महामाया योगमाया महायोगेश्वरी प्रिया ॥ ६० ॥
प्रकृतिर्भगवन्मायाशक्तिर्निद्रा यशस्करी ॥ ६१ ॥
प्रद्युम्नमाता साध्वी च सुखसौभाग्यसिद्धिदा ॥ ६२ ॥
सर्वातिशायिनी प्रीतिर्विश्वशक्तिर्महाबला ॥ ६३ ॥
हृद्गृहा गोपिनी गुह्या गणगन्धर्वसेविता ॥ ६४ ॥
महायोगेश्वरवृता योगा योगेश्वरप्रिया ॥ ६५ ॥
त्रिवर्त्मगा त्रिलोकस्था त्रिविक्रमपदोद्भवा ॥ ६६ ॥
सुतारिणी तारयन्ती भूरितारेश्वरप्रभा ॥ ६७ ॥
अध्यात्मविद्या विघ्नेशी पद्मस्था परमेष्ठिनी ॥ ६८ ॥
गौरी वागीश्वरी गोप्त्री गायत्री कमलोद्भवा ॥ ६९ ॥
सिद्धिः स्वाहा स्वधा स्वस्तिः सुधा सर्वार्थसाधिनी ॥ ७० ॥
श्रुतिर्मेधा धृतिर्ह्रीः श्रीर्विद्या विबुधवन्दिता ॥ ७१ ॥
प्रतिज्ञा सन्ततिर्भूतिर्द्यौः प्रज्ञा विश्वमानिनी ॥ ७२ ॥
सन्ध्या मेधा प्रभा भीमा सर्वाकारा सरस्वती ॥ ७३ ॥
सौम्याभोगा महाभोगा भोगिनी भोगदायिनी ॥ ७४ ॥
हिरण्यगर्भा सुश्रोणी हारिणी रमणी रमा ॥ ७५ ॥
त्रैलोक्यमण्डना नारीनरेश्वरवरार्चिता ॥ ७६ ॥
पद्मस्था पद्मनिलया पद्ममालाविभूषिता ॥ ७७ ॥
विचित्ररत्नमुकुटा विचित्राम्बरभूषणा ॥ ७८ ॥
महानारायणी देवी वैष्णवी वीरवन्दिता ॥ ७९ ॥
जगत्सम्पूरणी विश्वा महाविभवभूषणा ॥ ८० ॥
नृसिंही भैरवी ब्राह्मी भास्करी व्योमचारिणी ॥ ८१ ॥
दृष्टा काम्या विश्वशक्तिर्बीजगत्यात्मदर्शना ॥ ८२ ॥
महोग्ररूपा वाराही नारसिंही हतासुरा ॥ ८३ ॥
त्रैलोक्यभूषणा भीमा श्यामा त्रैलोक्यमोहिनी ॥ ८४ ॥
शङ्खिनी लेखिनी स्वस्था लिखिता खेचरेश्वरी ॥ ८५ ॥
कल्याणी कामधुग्ज्वालामुखी चोत्पलमालिका ॥ ८६ ॥
अजिता वर्षिणी रीतिर्भेरुण्डा गरुडासना ॥ ८७ ॥
महामन्दारविभवा शिवानन्दा रतिप्रिया ॥ ८८ ॥
सत्क्रिया देवसेना च हिरण्यरजताश्रया ॥ ८९ ॥
हिरण्यपद्मवर्णा च हरिभद्रा सुदुर्धरा ॥ ९० ॥
पद्मानना नित्यपुष्टा देवमाताऽमृतोद्भवा ॥ ९१ ॥
आदित्यवर्णा चन्द्राभा गन्धद्वारा दुरासदा ॥ ९२ ॥
कल्याणी वरदा वामा वामेशी विन्ध्यवासिनी ॥ ९३ ॥
कंसविद्राविणी दुर्गा कौमारी कौशिकी क्षमा ॥ ९४ ॥
विरूपाक्षी विशालाक्षी भक्तानां परिरक्षिणी ॥ ९५ ॥
घण्टानिनादबहुला जीमूतध्वनिनिस्स्वना ॥ ९६ ॥
सत्योपयाचिता चैका कौबेरी ब्रह्मचारिणी ॥ ९७ ॥
दारिद्र्यदुःखशमनी घोरदुर्गार्तिनाशिनी ॥ ९८ ॥
क्षीराब्धितनया पद्मा कमला धरणीधरा ॥ ९९ ॥
प्रज्ञाधाराऽमितप्रज्ञा वेदमाता यशोवती ॥ १०० ॥
अन्तर्वेदी दक्षिणा च ब्रह्मचर्यपरागतिः ॥ १०१ ॥
अम्बिका सुरभिः सिद्धा सिद्धविद्याधरार्चिता ॥ १०२ ॥
विश्वसंहारिणी दीप्तिस्तापनी ताण्डवप्रिया ॥ १०३ ॥
क्षीरधारासुप्रभावा लोकमाता सुवर्चसा ॥ १०४ ॥
आप्यायनी पावनी च दहनी दहनाश्रया ॥ १०५ ॥
सर्वकामप्रदा भद्रा सुभद्रा सर्वमङ्गला ॥ १०६ ॥
हंसा हीनकरी हंसी हृद्या हृत्कमलालया ॥ १०७ ॥
सावित्री सत्यसङ्कल्पा कामदा कामकामिनी ॥ १०८ ॥
भोगप्रिया भोगवती भोगीन्द्रशयनासना ॥ १०९ ॥
श्रीमती च शुभाकारा परमैश्वर्यभूतिदा ॥ ११० ॥
निश्रेणिः सर्वदेहस्था सर्वभूतनमस्कृता ॥ १११ ॥
तोषिणी पूर्णचन्द्राभा एकानन्दा शतानना ॥ ११२ ॥
कूष्माण्डी दारुणा चण्डा किराती नन्दनालया ॥ ११३ ॥
सौदामिनी मेघरवा दैत्यदानवमर्दिनी ॥ ११४ ॥
काश्यपी शुभदाना च वनमाला शुभा वरा ॥ ११५ ॥
गान्धर्वी रेवती गङ्गा शकुनी विमलानना ॥ ११६ ॥
आज्यपा वज्रकौमारी सोमपा कुसुमाश्रया ॥ ११७ ॥
मनोभवा कामचारा सिद्धचारणसेविता ॥ ११८ ॥
रसलक्ष्मीर्जगद्योनिर्गन्धलक्ष्मीर्वनाश्रया ॥ ११९ ॥
विरिञ्चिमाता विभवा वरवारिजवाहना ॥ १२० ॥
अनाहता कुण्डलिनी नलिनी वनवासिनी ॥ १२१ ॥
सर्वमङ्गल्यमाङ्गल्या सर्वकामसमृद्धिदा ॥ १२२ ॥
सिनीवाली कुहू राका अमा चानुमतिर्द्युतिः ॥ १२३ ॥
मयूरी वज्रवेताली वज्रहस्ता वरानना ॥ १२४ ॥
राजश्रीरूपसहिता ब्रह्मश्रीर्ब्रह्मवन्दिता ॥ १२५ ॥
सुपुष्पा पुष्पनिलया फलश्रीर्निष्कलप्रिया ॥ १२६ ॥
कद्रूर्धनायुः कपिला सुरसा सुरमोहिनी ॥ १२७ ॥
सुप्रभा ज्वालिनी दीप्तिस्तृप्तिर्व्याप्तिः प्रभाकरी ॥ १२८ ॥
रत्ना रत्नावलीभूता शतधामा शतापहा ॥ १२९ ॥
साध्याऽदितिर्दितिर्देवी मृगवाहा मृगाङ्कगा ॥ १३० ॥
हिरण्यरजतद्वन्द्वा शङ्खभद्रासनस्थिता ॥ १३१ ॥
मरीचिश्चीरवसना पूर्णचन्द्रार्कविष्टरा ॥ १३२ ॥
मरीचिज्वालिनी धूम्रा हव्यवाहा हिरण्यदा ॥ १३३ ॥
भास्वरा संहतिस्तीक्ष्णा प्रचण्डज्वलनोज्ज्वला ॥ १३४ ॥
कपिला नीलरक्ता च सुषुम्ना विस्फुलिङ्गिनी ॥ १३५ ॥
सम्पूर्णमण्डला पूषा स्रंसिनी सुमनोहरा ॥ १३६ ॥
सुवर्णकरणी श्रेष्ठा मृतसञ्जीवनी रणे ॥ १३७ ॥
ब्रह्मिष्ठा ब्रह्मसहिता ऐन्दवी रत्नसम्भवा ॥ १३८ ॥
नित्योदिता नित्यदृष्टा नित्यकामकरीषिणी ॥ १३९ ॥
विदेहपूजिता कन्या माया विजयवाहिनी ॥ १४० ॥
विश्वेश्वरी गणवती मण्डला मण्डलेश्वरी ॥ १४१ ॥
प्रत्यङ्गिरा सोमगुप्ता मनोऽभिज्ञा वदन्मतिः ॥ १४२ ॥
अमृता धारिणी हर्षा विनता वल्लकी शची ॥ १४३ ॥
आगता निर्गता वज्रा सुहिता सहिताऽक्षता ॥ १४४ ॥
करुणाधारसम्भूता कमलाक्षी शशिप्रिया ॥ १४५ ॥
माला काञ्चनमाला च सद्वज्रा कनकप्रभा ॥ १४६ ॥
विजृम्भणा च वज्राख्या शृङ्खला कमलेक्षणा ॥ १४७ ॥
मूलप्रकृतिरीशानी योगमाता मनोजवा ॥ १४८ ॥
धुरन्धरा च बाला च धर्मसेव्या तथागता ॥ १४९ ॥
सुमुखी सर्वतोभद्रा गुह्यशक्तिर्गुहालया ॥ १५० ॥
व्योमशक्तिर्महादेहा व्योमगा मधुमन्मयी ॥ १५१ ॥
तिलोत्तमोर्वशी रम्भा स्वामिनी सुरसुन्दरी ॥ १५२ ॥
ककुद्मिनी चारुपृष्ठा दृष्टादृष्टफलप्रदा ॥ १५३ ॥
हिमशैलेन्द्रसङ्काशा गजेन्द्रवरवाहना ॥ १५४ ॥
सर्वोत्कृष्टा सर्वमयी सर्वा सर्वेश्वरप्रिया ॥ १५५ ॥
विष्णुवक्षःस्थलगता किमतः परमुच्यते ॥ १५६ ॥
सा देवी पापहन्त्री च सान्निध्यं कुरुतान्मम ॥ १५७ ॥
परावरेण भेदेन मुख्यगौणेन भागतः ॥ १५८ ॥
शुचिः समाहितो भूत्वा भक्तिश्रद्धासमन्वितः ॥ १५९ ॥
भोगैश्च मधुपर्काद्यैर्यथाशक्ति जगद्गुरुम् ॥ १६० ॥
ततो नामसहस्रेण तोषयेत्परमेश्वरीम् ॥ १६१ ॥
प्रसादाभिमुखी लक्ष्मीः सर्वं तस्मै प्रयच्छति ॥ १६२ ॥
कारणत्वं न तिष्ठन्ति जगत्यस्मिंश्चराचरे ॥ १६३ ॥
सुप्रीताः शक्तयस्तस्य सिद्धिमिष्टां दिशन्ति हि ॥ १६४ ॥
तदंशशक्तिमन्तोऽन्ये ब्रह्मेशानादयो यथा ॥ १६८ ॥
ज्ञानादिषाड्गुण्यमयी या प्रोक्ता प्रकृतिः परा ॥ १६६ ॥
परा परेशी सर्वेशी सर्वाकारा सनातनी ॥ १६७ ॥
जगच्चराचरमिदं सर्वं व्याप्य व्यवस्थिता ॥ १६८ ॥
सौम्या सौम्येन रूपेण संस्थिता नटजीववत् ॥ १६९ ॥
या या तु नारीभावस्था तत्र लक्ष्मीर्व्यवस्थिता ॥ १७० ॥
अथ किं बहुनोक्तेन नरनारीमयो हरिः ॥ १७१ ॥
महाविभूतिं दयितां ये स्तुवन्त्यच्युतप्रियाम् ॥ १७२ ॥
पद्मयोनिरिदं प्राप्य पठन् स्तोत्रमिदं क्रमात् ॥ १७३ ॥
सकामानां च फलदामकामानां च मोक्षदाम् ॥ १७४ ॥
महापद्मनिषण्णां तां लक्ष्मीमजरतां नमः ॥ १७५ ॥
क्वचिदमलगतस्था शङ्खभद्रासनस्थिता ।
क्वचिदपि दयिताङ्गे चामरव्यग्रहस्ता
क्वचिदपि सृणिपाशं बिभ्रती हेमकान्तिः ॥ १७६ ॥
