इन्द्रादिदैवतैः सेव्यमीडे राघवनन्दनम् ॥ १ ॥
पीनवक्षःस्थलं वन्दे पूर्णं राघवनन्दनम् ॥ २ ॥
दण्डकामुनिमुख्यानां दत्ताभयमुपास्महे ॥ ३ ॥
कातरीकृतदैत्यौघं कलये रघुनन्दनम् ॥ ४ ॥
खरकोदण्डहस्तं च खस्वरूपमुपास्महे ॥ ५ ॥
गम्भीरसत्त्वमैक्ष्वाकं गच्छामि शरणं सदा ॥ ६ ॥
घूत्कारद्रुतरक्षौघं प्रपद्ये रघुनन्दनम् ॥ ७ ॥
चन्द्रबिम्बमुखं वन्दे चतुरं रघुनन्दनम् ॥ ८ ॥
सुदीर्घबाहुयुगलं सुनाभिं राघवं भजे ॥ ९ ॥
हरिं रविकुलोद्भूतं हाटकालङ्कृतं भजे ॥ १० ॥
रक्षोगणयुगान्ताग्निं रामचन्द्रमुपास्महे ॥ ११ ॥
लसदिन्दीवरश्यामं लक्ष्मणाग्रजमाश्रये ॥ १२ ॥
वरपीताम्बराभासं वन्दे राघवभूषणम् ॥ १३ ॥
शतपत्रदृशं वन्दे शुभं दशरथात्मजम् ॥ १४ ॥
कुसुम्भवस्त्रसंवीतं पुत्रं राघवमाश्रये ॥ १५ ॥
महनीयमहं वन्दे महतां कीर्तिवर्धनम् ॥ १६ ॥
मुक्तः संसृतिबन्धाद्धि स याति परमं पदम् ॥ १७ ॥
