॥ एकादशः सर्गः ॥
रचितरुचिरभूषां दृष्टिमोषे प्रदोषे स्फुरति निरवसादां कापि राधां जगाद ॥ 59 ॥
सम्प्रति मञ्जुलवञ्जुलसीमनि केलिशयनमनुयातम् ॥
मुग्धे मधुमथनमनुगतमनुसर राधिके ॥ 1 ॥
मुखरितमणीमञ्जीरमुपैहि विधेहि मरालविकारम् ॥ 2 ॥
कुसुमशरासनशासनबन्दिनि पिकनिकरे भज भावम् ॥ 3 ॥
प्रेरणमिव करभोरु करोति गतिं प्रतिमुञ्च विलम्बम् ॥ 4 ॥
पृच्छ मनोहरहारविमलजलधारममुं कुचकुम्भम् ॥ 5 ॥
चण्डि रसितरशनारवडिण्डिममभिसर सरसमलज्जम् ॥ 6 ॥
चल वलयक्वणीतैरवबोधय हरमपि निजगतिशीलम् ॥ 7 ॥
हरिविनिहितमनसामधितिष्ठतु कण्ठतटीमविरामम् ॥ 8 ॥
स त्वां पश्यति वेपते पुलकयत्यानन्दति स्विद्यति प्रत्युद्गच्छति मूर्च्छति स्थिरतमःपुञ्जे निकुञ्जे प्रियः ॥ 60 ॥
धूर्तानामभिसारसत्वरहृदां विष्वङ्निकुञ्जे सखि ध्वान्तं नीलनिचोलचारु सदृशां प्रत्यङ्गमालिङ्गति ॥ 61 ॥
एतत्तमालदलनीलतमं तमिश्रं तत्प्रेमहेमनिकषोपलतां तनोति ॥ 62 ॥
द्वारे निकुञ्जनिलयस्यहरिं निरीक्ष्य व्रीडावतीमथ सखी निजगाह राधाम् ॥ 63 ॥
विलस रतिरभसहसितवदने ॥
प्रविश राधे माधवसमीपमिह ॥ 1 ॥
विलस कुचकलशतरलहारे ॥ 2 ॥
विलस कुसुमसुकुमारदेहे ॥ 3 ॥
विलस रसवलितललितगीते ॥ 4 ॥
विलस मदनरससरसभावे ॥ 5 ॥
विलस दशनरुचिरुचिरशिखरे ॥ 6 ॥
विलस चिरमलसपीनजघने ॥ 7 ॥
भणति जयदेवकविराजे ॥ 8 ॥
अस्याङ्गं तदलङ्कुरु क्षणमिह भ्रूक्षेपलक्ष्मीलव-क्रीते दास इवोपसेवितपदाम्भोजे कुतः सम्भ्रमः ॥ 64 ॥
सिञ्जानमञ्जुमञ्जीरं प्रविवेश निवेशनम् ॥ 65 ॥
जलनिधिमिव विधुमण्डलदर्शनतरलिततुङ्गतरङ्गम् ॥
हरिमेकरसं चिरमभिलषितविलासं सा ददार्श गुरुहर्षवशंवदवदनमनङ्गनिवासम् ॥ 1 ॥
स्फुटतरफेनकदम्बकरम्बितमिव यमुनाजलपूरम् ॥ 2 ॥
नीलनलिनमिव पीतपरागपतलभरवलयितमूलम् ॥ 3 ॥
स्फुटकमलोदरखेलितखञ्जनयुगमिव शरदि तडागम् ॥ 4 ॥
स्मितरुचिरुचिरसमुल्लसिताधरपल्लवकृतरतिलोभम् ॥ 5 ॥
तिमिरोदितविधुमण्दलनिर्मलमलयजतिलकनिवेशम् ॥ 6 ॥
मणिगणकिरणसमूहसमुज्ज्वलभूषणसुभगशरीरम् ॥ 7 ॥
प्रणमत हृदि सुचिरं विनिधाय हरिं सुकृतोदयसारम् ॥ 8 ॥
इदानीं राधायाः प्रियतमसमालोकसमये पपात स्वेदाम्बुप्रसर इव हर्षाश्रुनिकरः ॥ 66 ॥
प्रियास्यं पश्यन्त्याः स्मरशरसमाकूलसुभगं सलज्जा लज्जापि व्यगमदिव दूरं मृगदृशः ॥ 67 ॥
