करुँ तब आरति होय निहाल॥
कपोलन पैं झूलै अलकै।
कर्ण में कर्णफूल चमकै,
नैन कजरारे, मोहिनियाँ डारे,
सुमन रतना रे,
सो चन्दन कुंकुम केसर भाल॥१॥
सुछबि जोड़ी राजत इक ठौर,
नहीं है उपमा कोई और,
निरखि रति लजै,
मैन मद तजै, अंग सुभ सजै,
सो भूषन बर मुक्ता-मनि-जाल॥२॥
प्रिया-प्रिय अनुपम सुषमा-कंद,
प्रेम-हिय छायो परमानंद, मंद मृदु हँसन,
रुचिर दुति दसन, मनोहर बसन,
दोउ सोहैं गल बहियाँ डाल॥३॥
सबै मिलि गावत सहित उमंग,
होत पुलकायमान अंग-अंग,
रंग जब चढ़त, प्रेम हिय बढ़त, नयन जल कढ़त
मधुर स्वर गावत दै दै ताल॥४॥
प्रनत जन रामेश्वर आधार,
जोरि कर बिनवत बारंबार, कछु नहिं बनत,
नेम-तप-वरत, रहों पद निरत,
करूँ नव आरति होइ निहाल॥५॥
