माला, पुस्तक, धारिणी, वीणा कर में साज॥
आदि शक्ति तुम जग कल्याणी॥
तीन लोक महं तुम विख्याता॥
प्रगट भई शारद जग जाना॥
जहाँ बैठी शारद जग माता॥
मैहर नगरी परम प्रकाशा॥
रूप चतुर्भुज अतिशय प्यारो॥
राज हंस तुम्हारो शचि वाहन॥
उरमणि भाल अनूप दिखावहिं॥
जगत्मातु तुम जग विहारिणी॥
शारद गुण गावत सुरभूपा॥
वरुण कुबेर करहिं अभिनन्दन॥
चण्ड-मुण्ड असुरन संहारा॥
दुर्गा बन शारद कल्याणी॥
रक्त बीज काटा रण मुण्डी॥
शारद सुयश सदैव बखाना॥
तुम्हारी दया शारदा माता॥
पुनि-पुनि करहिं शारदा सेवा॥
सब जग व्यापहिं शारद माया॥
परम शक्तिमय परम प्रकाशा॥
शिव विरंचि पूजहिं नर भूपा॥
शारद के गुण गावहिं वेदा॥
निर्गुण-सगुण शारदहिं रुपा॥
व्यापइ नहिं कलिकाल प्रचण्डा॥
शारद कृपा चमकते सारे॥
बन्दउ शारद जगत तारिणी॥
तुम्हारी कृपा शारदा माई॥
मातु शारदा ज्ञान तुम्हारा॥
जय जय जय शारदा भवानी॥
निश्चय ते भव सागर तरहीं॥
होई सकल विधि अति कल्याणा॥
भजहुँ शारदा अति सुख पाई॥
दिव्य किरण देवहुँ मम ओरा॥
मातु शारदा सुमिरई जोई॥
भजहुँ शारदा होवहिं ज्ञाना॥
पाठ करहिं भव छटई फेरी॥
शारद मातु करहिं कल्याणा॥
नेति-नेति कह वेद बखाना॥
कृपा दृष्टि कीजै मम ओरा॥
तिन कहँ कतहुँ नाहि दुःखभारी॥
मातु शारदा देहुँ आशीषा॥
सकल अविद्या दूर कर, सदा बसहु उरगेहुँ॥
जय-जय माई शारदा, मैहर तेरौ धाम।
शरण मातु मोहिं लीजिए, तोहि भजहुँ निष्काम॥
