जयति शशांक! कला-निधि, तुम हो नित्य सुधा-सागर॥
जयति निशाकर! शुभ-उजियारी॥
तुमसे रात्रि शोभा पाती,
किरण तुम्हारी मन को भाती॥
क्षीर-सिंधु से तुम उपजाए,
कहे जात हो अत्रि-सुत-आए॥
विष्णु-वाम-दृग-अंश स्वरूपा,
विश्व-मोद-कारक! तव रूपा॥
विचरत नभ में सबके पथ-रथ॥
अमृत-किरणों से मन हरते,
सबकी पीड़ा तुम हर लेते॥
जब तुम उदित गगन में होते,
पुष्प, लता सब हर्षित होते॥
सभी जीव-जंतु सुख पाते,
शीतल- मंद-पवन-लहराते॥
तुम ही हो सब देव-महेश॥
तुम हो सोलह-कला-युक्त-स्वामी,
घटते-बढ़ते अन्तर्यामी॥
जब-जब तुम पूरे हो जाते,
विविध-उत्सव तब हैं मनाते॥
तुम पर जब राहु चढ़ आता,
पूर्ण-ग्रहण जग में कहलाता॥
तेरे बिन सब निष्फल होते॥
तुम हो औषधि-वन के स्वामी,
तुम बिन व्यर्थ सभी फल-कामी॥
तुमसे वर्षा-ऋतु कहलाती,
तुम्हारी कला अन्न उपजाती॥
फसलें तुमसे बल हैं पाती,
धरती पर हरियाली छाती॥
तुमसे सब हैं भाग्य-सँवारे॥
हो मन के स्वामी तुम देवा,
करते सुर-नर-मुनि सब सेवा॥
रोहिणी-प्रिय, देव! हमारे,
सब संकट-विपदा को टारे॥
जो कोई जपता नाम तुम्हारा,
हर लेते हो सब दुःख सारा॥
तुम हर लेते हो सब क्रंदन॥
जिस पर होवे कृपा तुम्हारी,
विपदा उसे न व्यापै भारी॥
जो नर जपता चन्द्र-मंत्र को,
पाता है वह सकल-सुख-तंत्र को॥
जिसकी होवे दशा तुम्हारी,
उसे न कोई चिंता भारी॥
उसकी तुम पीड़ा सब हरता॥
श्वेत-पुष्प, अक्षत, दधि-मेवा,
करते हैं सब तुम्हारी सेवा॥
चालीसा जो पढ़े-सुनावे,
सब सुख-भोग, परम-पद पावे॥
‘लखि’ दीन की सुनो कहानी,
जय-जय चन्द्रदेव! सुखखानी॥
शरणागत की रक्षा करो, हे अमृत की खान॥
