अंक बिराजत अविनासी।
ब्रह्मा-बिष्नु-सिवादि सकल
सुर करत आरती उल्ल्लासी॥
सब जुरि आये कैलासी।
करत ध्यान, गंधर्व गान-रत,
पुष्पनकी हो वर्षा-सी॥
जिन पुत्र परम गोलोकासी।
अचल अनादि अखंड परात्पर
भक्तहेतु भव-परकासी॥
बिघ्नबिनासन दुखनासी।
तुष्टि पुष्टि सुभ लाभ लक्ष्मि सँग
रिद्धि सिद्धि-सी हैं दासी॥
द्वादस नाम कहे छासी।
कामधेनु चिंतामनि सुरतरु
चार पदारथ देतासी॥
सुंडि ढुंढि पुर पूजा-सी।
चार भुजा मोदक-करतल सजि
अंकुस धारत फरसा-सी॥
उन्दुरवाहन सुखरासी।
जिनके सुमिरन सेवन करते
टूट जात जमकी फाँसी॥
मन लगाय जो कोइ गासी।
दूर करें भवकी बाधा प्रभु
मुक्ति जन्म निजपद पासी॥
