ध्यान धरत ही होत नर दुःख सागर से पार॥
भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम।
कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम॥
शान्ति दायिनी रूप मनोरम॥
वेश मनोहर ललित अनुपा॥
माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी॥
दर्शन से हो संकट मोचन॥
रिद्धि-सिद्धि की पुत्री ज्ञानी॥
सब पर करो कृपा की छाया॥
अखिल विश्व है तुमको ध्याता॥
को कहि सके चरित्र तुम्हारे॥
सुमिरन तब करके सुख लहिये॥
कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी॥
दुष्ट नाशिनी महाकराली॥
भक्तजनों का दुःख मिटाती॥
पूजत नित्य भक्त जन सेवी॥
महा लक्श्मी तुम कल्याणी॥
सुख दुख सबकी साक्शी तुम हो॥
बनी भद्रकाली तुम अम्बे॥
अखिल विश्व तेरा यश गाता॥
अन्नपूर्णा नाम सुहाता॥
तुम्हीं शारदा अमृत वाणी॥
दुःख दारिद्र सब मेटो पल में॥
नारद देव और देवेशा।
ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी॥
वह पाता भक्ति का मोती॥
ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता॥
ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै॥
ताकी पूरण करो कामना॥
जयति जयति माता जगधात्री॥
जो व्रत करे तुम्हारा पावन॥
कथा तुम्हारी सुने सुनावै॥
फिर प्रसाद पावे शुभकारी॥
दान-दक्शिणा दे विप्रन को॥
मनवांछित फल पावें भारी॥
सो निश्चय भव से तर जावे॥
निश्चय मनवांछित वर पावै॥
अमर सुहागिन हो वह नारी॥
भवसागर से उतरे पारा॥
विघ्न विनाशन मंगल करनी॥
वेगि खबर लो मात हमारी॥
देह भक्ति वर हम को माता॥
सो भवसागर से तर जावे॥
