शाकम्भरी माँ चालीसा का करे प्रख्यान ॥
आनंदमयी जगदम्बिका अनन्तरूप भण्डार,
माँ शाकम्भरी की कृपा बनी रहे हर बार ॥
पूर्ण ब्रह्म सदा दुःखहारी ॥
आंनद चेतन विश्वविधाता ॥
तुम ही सदा भगतन हितकारी ॥
ब्रह्म हरी हर मात अपर्णा ॥
शरणागत घर भरती खुशहाली ॥
जल-थल-नभ हो अविनाशी ॥
जोतमन मर्यादा जोत स्वरूपा ॥
जोत अपनी प्रकट हो आई ॥
मात शताक्षि संग ही साजे ॥
तीसरी बहन की जोत निराली ॥
अद्भुत चंचल चित्त चितेरी ॥
दानव दल से खूब लड़ा है ॥
सदा रहे सन्तन हितकारी ॥
सदा शाकम्भरी माँ का चेरा ॥
युद्ध भूमि में माँ संग साजे ॥
बहिन मात की अति विकराली ॥
ध्याते तुम्हें परमार्थ वादि ॥
बाल रूप शरणागत माता ॥
प्रथम पूजने की अधिकारी ॥
शिव शक्ति हो दुष्ट विदारण ॥
जिसकी होती पहली पूजा ॥
चले संग यश गाता तेरा ॥
तेरी लीला अति विस्तारी ॥
रक्त पान कर असुर हनी हो ॥
छिन्न मस्तिका रूप लिया था ॥
सात कुण्ड में आप विराजे ॥
भोजन दे दे जन जन तारा ॥
शोक पात जन दुःख निवारे ॥
कान्त शिवा भगतन सुखदाई ॥
ध्वजा नारियल तिलक सिंदूरी ॥
ये ही भेंट ले दुःख निवारी ॥
कोढ़ी काया सफल बनाती ॥
निर्धन को धन खूब दिलाती ॥
साधु सज्जन काज संवारे ॥
शाकम्भरी माँ दुःख की नाशी ॥
जन्म जन्म पहचान हमारी ॥
जै जै जै जग जननी तुम्हारी ॥
संकट दुःख दुविधा टारी ॥
मात कृपा अति सुख पावे ॥
भाव शाकम्भरी तत्त्व प्रकाशी ॥
विनिती सुन शाकम्भरी मोरी ॥
जननी करना भव निस्तारा ॥
मातु कृपा अधिकारी सोई ॥
शोक मोह शत्रुन संहारे ॥
श्रद्धा भक्ति से चालीसा गावे ॥
सपरिवार मगन हो गावे ॥
कान्त शाकम्भरी अति सुखदाई ॥
शाकम्भरी जननि शिवे रखना मेरी लाज ॥
युग युग तक व्रत तेरा करे भक्त उद्धार,
वो ही तेरा लाड़ला आवे तेरे द्वार ॥
