शिवध्यानलग्नां शिवज्ञानमूर्तिं शिवाख्यामतीतां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १॥
नवीनार्कवर्णां नवीनेन्दुचूडां परब्रह्मपत्नीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ २॥
परामन्त्रकां पाण्ड्यसिंहासनस्थां परन्धामरूपां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ३॥
ललाटेक्षणार्धाङ्गलग्नोज्ज्वलाङ्गीं परन्धामरूपां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ४॥
त्रिबीजाधिरूढां त्रिमूर्त्यात्मविद्यां परब्रह्मपत्नीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ५॥
क्वणन्नूपुरोपेतलाक्षारसार्द्रस्पुरत्पादपद्मां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ६॥
अखण्डामनन्यामचिन्त्यामलक्ष्याममेयात्मविद्यां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ७॥
महायोगपीठे शिवाकारमञ्चे सदा सन्निषण्णां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ८॥
सुधामण्डलस्थे सुनिर्वाणपीठे सदा सञ्चरन्तीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ९॥
शिवाख्ये कलातीतनिश्शब्ददेशे सदा सञ्चरन्तीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १०॥
निरालम्बपद्मे कलाषोडशान्ते सदा सञ्चरन्तीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ ११॥
महाषोडशान्ते मनोनाशदेशे सदा सञ्चरन्तीं भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १२॥
सहस्रारपद्मोचितां चित्प्रकाशप्रवाहप्रलीनां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १३॥
परां त्रिस्तनीं तां चतुष्कूटमध्ये परन्धामरूपां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १४॥
सदा स्त्रावयन्तीं सुधामूर्तिमम्बां परञ्ज्योतिरूपां भजे पाण्ड्यबालाम् ॥ १५॥
नमस्ते नमस्ते सुमीनाक्षि देवि नमस्ते नमस्ते पुनस्ते नमोऽस्तु ॥ १६॥
