Lord Krishna

श्रीनरोत्तम-प्रार्थना

(Sri Narottama Prarthna)

Srila Narottama Dasa Thakura

Also known as shri narottama prarthna · shree narottama prarthna · narottama prarthna

Narottama Dasa Thakura's book of prayers — fifty-five songs, in Bengali written here in Devanagari, and the register is longing rather than praise. Song after song begins by asking when. When will the body thrill at saying Gauranga and the eyes run at Hari, Hari; when will worldly wanting become a small thing; when shall I see that Vrindavana and understand the love of the Youthful Pair. The self-reproach is unsparing: I have not served those feet even a sesame's worth; having got a human birth and not worshipped, I have knowingly drunk poison. Between the laments it names its lineage, the six Goswamis and Krishnadasa Kaviraja, and its household — Nityananda my wealth, Gaurachandra my lord, Gadadhara my family, the dust of Vaishnavas' feet my bathing water. The last songs turn to Vraja, and one drowns in it: an ocean of love with no direction in it, and Narottama cannot swim.

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Script: Devanagari (देवनागरी) — also the script of Hindi, Marathi, Nepali and Konkani.

श्रीश्रीकृष्णचैतन्यनित्यानन्दौ जयतः
श्रीश्रीनरोत्तम ठाकुर महाशय—विरचित श्रीनरोत्तम-प्रार्थना
‘गौरांग’-बलिते हवे पुलक शरीर। ‘हरि-हरि’-बलिते नयने बहे नीर।। आर कबे निताईचाँद करुणा करिवे। संसार वासना मोर कबे तुच्छ हवे।। विषय छाड़िया कबे शुद्ध हवे मन। कबे हाम हेरव सेइ वृन्दावन।। रूप-रघुनाथ-पदे हवे आकृति। कबे हाम बुझव से युगल-पिरीति।। रूप-रघुनाथ-पदे रहु मोर आश। प्रार्थना करये सदा नरोत्तमदास।।१।।
हरि ! हरि ! कि मोर करम अति मन्द। ब्रजे राधाकृष्ण पद, ना सेविनु तिल आध, ना बुझिनु रागेर सम्बन्ध।। स्वरूप सनातन रूप, रघुनाथ भट्ट-युग, भूगर्भ श्रीजीव लोकनाथ। इहाँ सबार पाद-पद्म, ना सेविनु तिल आध, किसे मोर पुरिवेक साध।। कृष्णदास कविराज, रसिक भकत माझ, जे रचिल चैतन्य-चरित। गौर गोविन्द लीला, शुनिले गलये शिला, ना डुबिल ताहे मोर चित्त।। ताहार भक्तेर संग, तांर संगे जांर संग, तार संगे नहिल केन वास। कि मोर दुःखेर कथा, जनम गोङानु वृथा, धिक् धिक् नरोत्तमदास।।२।।
राधाकृष्ण ! निवेदन एइ जन करे। दोंह अति रसमय, सकरुण हृदय, अवधान कर नाथ मोरे। हे कृष्ण गोकुल चन्द्र, हे गोपी प्राण वल्लभ, हे हे कृष्णप्रिया शिरोमणि। हेन गौरी श्याम गाय, श्रवणे परश पाय, गुन शुनि जुड़ाय पराण।। अधम दुर्गति जने, केवल करुणा मने, त्रिभुवने ए यश खेयाति। शुनिया साधुर मुखे, शरण लइनु सुखे, उपक्षिले नाहि मोर गति।। जय राधे जय कृष्ण, जय जय राधे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण जय जय राधे। अंजलि मस्तके धरि, नरोत्तम भूमे पड़ि, कहे दोंहे पुराओ मन साधे।।३।।
हरि ! हरि ! हेन दिन हइवे आमार। दुहुँ अंग निरखिव, दुहुँ अंग परशिव, सेवन करिव दोंहाकार।। ललिता विशाखा संगे, सेवन करिव रंगे, माला गांथि दिव नाना फूले। कनक सम्पुटि करि, कर्पूर ताम्बुल भरि, योगाइव वदन-कमले।। राधाकृष्ण श्रीचरण, सेइ मोर प्राणधन, सेइ मोर जीवन उपाय। जय पतित-पावन, देह मोरे एइ धन, तुया बिने अन्य नाहि भाय।। श्रीगुरु करुणा-सिन्धु, अधम जनार बन्धु, लोकनाथ लोकेर-जीवन। हा हा प्रभु ! कर दया, देह मोरे पद छाया, नरोत्तम लइल शरण।।४।।
हरि हरि ! विफले जनम गोङाइनु। मनुष्य जनम पाइया, राधाकृष्ण ना भजिया, जानिया शुनिया विष खाइनु।। गोलोकेर प्राणधन, हरिनाम संकीर्तन, रति ना जन्मिल केने ताय। संसार विषानले, दिवा निशि हिया ज्वले, जुड़ाइते ना कैनु उपाय।। ब्रजेन्द्रनन्दन जेई, शचीसुत हैल सेई, बलराम हइल निताइ। दीन हीन जत छिल, हरिनामे उद्धारिल, तार साक्षी जगाइ-माधाइ।। हा हा प्रभु नन्दसुत, वृषभानुसुता युत, करुणा करह एइ बार। नरोत्तमदास कय, ना ठेलिह रांगा पाय, तोमा बिने के आछे आमार।।५।।
हरि हरि कबे मोर हइवे सुदिन। भजिब से राधाकृष्ण हञा प्रेमाधीन।। सुयन्त्रे मिशाये गाव सुमधुर तान। आनन्दे करिवे दोंहाई रूपगुण गान।। राधिका गोविन्द बलि कांदिब उच्चैः स्वरे। भिजिये सकल अंग नयनेर नीरे।। एइ बार करुणा कर ललिता विशाखा। सख्य भावे मोर प्रभु सुबलादि सखा।। सबे मिलि कर दया पुरुक मोर आश। प्रार्थना करये सदा नरोत्तमदास।।६।।
प्राणेश्वर निवेदन एइ जन करे। गोविन्द गोकुलचन्द्र, परम आनन्दकन्द, गोपीकुल-प्रिय देख मोरे।। तुया प्रिय पदसेवा, एइ धन मोरे दिया, तुमि प्रभु करुणार निधि। परम मंगल यश, श्रवणे परम रस, कार किवा कार्य्य नहे सिद्धि।। दारुण संसार गति, विषयेते लुब्ध मति, तुया विस्मरण शूल बुके। जर जर तनु मन, अचेतन अनुक्षण, जीयन्ते मरण भेल दुःखे।। मो बड़ अधम जने, कर कृपा निरीक्षणे, दास करि राख वृन्दावने। श्रीकृष्णचैतन्य नाम, प्रभु मोर गौर-धाम, नरोत्तम लइल शरणे।।७।।
गोविन्द गोपीनाथ ! कृपा करि राख निज पदे। काम क्रोध छय जने, लये फिरे नाना स्थाने, विषय भुञ्जाय नाना मते।। हइया मायार दास, करि नाना अभिलाष, तोमार स्मरण गेल दूरे। अर्थ लाभ एइ आशे, कपट वैष्णव-वेशे, भ्रमिया बेड़ाइ घरे-घरे।। अनेक दुःखरे परे, लये छिले ब्रजपुरे, कृपा डोर गलाय बाँधिया। दैव माया बलात्कारे, खसाइया सेइ डोरे, भव कूपे दिलेक डारिया।। पुनः यदि कृपा करि, ए जनार केशे धरि, टानिया तुलह ब्रजधामे। तबे से देखिए भाल, नतु वा पराण गेल, कहे दीन दास नरोत्तमे।।८।।
मोरे प्रभु मदनगोपाल ! श्रीगोविन्द गोपीनाथ, तुमि अनाथेर नाथ, दया करो मुञि अधमेरे। संसार सागर घोरे, पड़ियाछि कारागारे, कृपा डोरे बान्धि लह मोरे।। अधम चाण्डाल आमि, दयार ठाकुर तुमि, सुनियाछि वैष्णवेर मुखे। ए बड़ भरोसा मने, लये फेल वृन्दावने, बंशीवट जेन देखि सुखे।। कृपा कर आगु गु़रि, लह मोरे केशे धरि, श्रीयमुना देह पद छाया। अनेक दिनेर आश, नहे जेन नैराश, दया कर ना करिह माया।। अनित्य शरीर धरि, आपन-आपन करि, पाछे-पाछे शमनेर भय। नरोत्तमदास भने, प्राण कान्दे रात्रि दिने, पाछे ब्रज प्राप्ति नाहि हय।। ९ ।।
धन मोर नित्यानन्द, पति मोर गौरचन्द्र, प्राण मोर युगलकिशोर। अद्वैत आचार्य्य बल, गदाधर मोर कुल, नरहरि विलासइ मोर।। वैष्णवेर पदधूलि, ताहे मोर स्नान-केलि, तर्पण मोर वैष्णवेर नाम। विचार करिया मने, भक्तिरस आस्वादने, मध्यस्थ श्रीभागवतपुराण।। वैष्णवेर उच्छिष्ट, ताहे मोर मन निष्ठ, वैष्णवेर नामेते उल्लास। वृन्दावने चबूतरा, ताहे मोर मन घेरा, कहे दीन नरोत्तमदास।।१० ।।
निताइ पद कमल, कोटि चन्द्र सुशीतल, जे छायाय जगत जुड़ाय। हेन निताइ बिने भाइ, राधाकृष्ण पाइते नाइ, दृढ़ करि धर निताइयेर पाय।। से सम्बन्ध नाहिं जार, वृथा जन्म गेल तार, सेइ पशु बड़ दुराचार। निताइ ना बलिल मुखे, मजिल संसार सुखे, विद्या-कुले कि करिवे तार।। अहंकारे मत्त हइया, निताइ पद पासरिया, असत्येर सत्य करि मानि। निताइयेर करुणा हबे, ब्रजे राधाकृष्ण पावे, भज निताइयेर चरण दु खानि।। निताइ चरण सत्य, ताँहार सेवक नित्य, निताइ पद सदा कर आश। नरोत्तम बड़ दुःखी, निताइ मोरे कर सुखी, राख रांगा चरणेर पाश।।११।।
भाइ भाइ ! भज मोर गौरांगचरण। ना भजिया मैनु दुःखे, डुबि गृह विष कूपे, दग्ध कैल ए पाँच पराण।। तापत्रय विषानले, अहर्निशि हिया ज्वले, देह सदा हय अचेतन। रिपु वश इन्द्रिय हैल, गोरा पद पासरिल, विमुख हइल हेन धन।। हेन गौर दयामय, छाड़ि सब लाज भय, काय मने लओ रे शरण। पामर दुर्मति छिल, तारे गोरा उद्धारिल, तारा हइल पतित-पावन।। गोरा द्विज नटराजे, बान्धह हृदय माझे, कि करिवे संसार शमन। नरोत्तमदास कहे, गोरा सम केह नहे, ना भजिते देन प्रेम धने।।१२।।
गौरांगेर दुटी पद, जार धन सम्पद, से जाने भकति-रस सार। गौरांगेर मधुर लीला, जार कर्णे प्रवेशिला, हृदय निर्म्मल भेल तार।। जे गौरांगेर नाम लय, तार हय प्रमोदय, तारे मुञि जाइ बलिहारी। गौरांग गुणेते झुरे, नित्य लीला तारे स्फुरे, से जन भकति अधिकारी।। गौरांगेर संगी-गणे, नित्य-सिद्ध करि माने, से जाय ब्रजेन्द्रसुत पाश। श्रीगौड़मण्डल भूमि, जेबा जाने चिन्तामणि, तार हय ब्रज भूमे वास।। गौर प्रेम रसाण्र्वे, से तरंगे जेवा डुबे, से राधा-माधव अन्तरंग। गृहे वा बनेते थाके, हा गौरांग बोले डाके, नरोत्तम मागे तार संग।।१३।।
श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु ! दया कर मोरे। तोमा बिने के दयालु जगत संसारे।। पतित पावन हेतु तव अवतार। मो सम पतित प्रभु ना पाइवे आर।। हा हा प्रभु नित्यानन्द प्रेमानन्द सुखी ! कृपावलोकन कर आमि बड़ दुःखी।। दया कर सीतापति अद्वैत गोसाईं। तव कृपा बले पाइ चैतन्यनिताई।। हा हा स्वरूप सनातन रूप रघुनाथ। भट्ट युग श्रीजीव हा प्रभु लोकनाथ।। दया कर श्रीआचार्य प्रभु श्रीनिवास। रामचन्द्र संग मागे नरोत्तमदास।।१४।।
जे आनिल प्रेमधन करुणा प्रचुर। हेन प्रभु कोथा गेला आचार्य्य ठाकुर।। काँहा मोर स्वरूप रूप काँहा सनातन। काँहा दास रघुनाथ पतित-पावन।। काँहा मोर भट्टयुग काँहा कविराज। एक काले कोथा गेला गौरा नटराज।। पाषाणे कुटिव माथा अनले पशिव। गौरांग गुणेर निधि कोथा गेले पाव।। ये सब संगीर संगे जे कैल विलास। से संग ना पाञा काँदे नरोत्तमदास।।१५।।
हरि हरि ! बड़ शेल मरमे रहिल। पाइया दुर्ल्लभ तनु श्रीकृष्णभजन बिनु, जन्म मोर विफल हइल।। ब्रजेन्द्रनन्दन हरि, नवद्वीपे अवतरि, जगत भरिया प्रेम दिल।। मुञि से पामर मति, विशेष कठिन अति, सेइ मोर करुणा नहिल।। स्वरूपसनातन रूप, रघुनाथ भट्टयुग, ताहाते ना हैल मोर रति।। दिव्य चिन्तामणि धाम वृन्दावन हेन स्थान, सेइ धामे ना कैनु वसति।। विशेष विषये मति, नहिल वैष्णवे रति, निरन्तर खेद उठे मने।। नरोत्तमदास कहे, जीवार उचित नहे, श्रीगुरुवैष्णव सेवा बिने।।१६।।
ठाकुर वैष्णव पद, अवनीर सम्पद, शुन भाई हञा एक मने।। आश्रय लइया सेवे, सेइ कृष्ण भक्ति लभे, आर सब मरे अकारणे।। वैष्णव चरण-जल, प्रेमभक्ति दिते बल, आर केह नहे बलवन्त।। वैष्णव चरण-रेणु, मस्तके भूषण बिनु, आर नाहि भूषणेर अन्त।। तीर्थ जल पवित्र गुणे, लिखियाछे पुराणे, से सब भक्तिर प्रपंचन।। वैष्णवेर पादोदक, सम नहे एइ सब, जाते हय वाञ्छित पूरण।। वैष्णव संगेते मन, आनन्दित अनुक्षण, सदा हय कृष्ण पर संग।। दीन नरोत्तम काँदे, हिया धैर्य नाहि बाँधे, मोरदशा केन हैल भंग।।१७।।
ठाकुर वैष्णवगण ! करि एइ निवेदन, मो बड़ अधम दुराचार।। दारुण संसार निधि, ताहे डुबाइल विधि, केशे धरि मोरे कर पार।। विधि बड़ बलवान, ना शुने धरम ज्ञान, सदाइ करम पाशे बाँधे।। ना देखि तारण लेश, जत देखि सब क्लेश, अनाथ कातरे तेञि काँदे।। काम क्रोध लोभ मोह मद अभिमान सह, आपन-आपन स्थाने टाने।। आमार ऐछन मन, फिरे जेन अन्धजन, सुपथ-विषय नाहि जाने।। ना लइनु सत मत, असते मजिल चित्त, तुया पाये ना करिनु आश।। नरोत्तमदासे कय, देखि शुनि लागे भय, तराइया लह निज पाश।।१८।।
एइ बार करुणा कर वैष्णव गोसाञि। पतित-पावन तोमा बिने केह नाइ।। काहार निकटे गेले पाप दूरे जाय। एमन दयाल प्रभु केवा कोथा पाय।। गंगार परश हइले पश्चाते पावन। दर्शने पवित्र कर एइ तोमार गुण।। हरिस्थाने अपराधे तारे हरिनाम। तोमा स्थाने अपराधे नाहिक एड़ान।। तोमार हृदये सदा गोविन्द विश्राम। गोविन्द कहेन मम वैष्णव पराण।। प्रति जन्मे करि आशा चरणेर धूलि। नरोत्तमे कर दया आपनार बलि।।१९।।
कि रूपे पाइव सेवा मुइँ दुराचार। श्रीगुरु वैष्णवे रति ना हैल आमार।। विशेष मायाते मन मगन हइल। वैष्णवेते लेश मात्र रति ना जन्मिल।। गले फाँस दिते फिरे माया से पिशाची। विषये भुलिया अन्ध हैनु दिवा निशि।। इहारे करिया जय छाड़ान ना जाय। साधु कृपा बिना आर नाहिक उपाय।। अदोष दरशि प्रभु पतित उद्धार। एइ बार नरोत्तमे करह निस्तार।।२०।।
हरि हरि ! कि मोर करम अभाग। विफले जन्म गेल, हृदये रहिल शेल, नाहि भेल हरि अनुराग।। यज्ञदान तीर्थस्नान, पुण्य-कर्म जपध्यान, अकारणे सबे गेल मोहे। बुझिलाम मने हेन, उपहास हय जेन, वस्त्रहीन अलंकार देहे।। साधुमुखे कथामृत, शुनिया विमल चित्त, नाहि भेल अपराध कारण। सतत असत संग, सकलि हइल भंग, कि करिव आइले शमन।। श्रुति स्मृति सदा कय, शुनियाछि एइ हय, हरि पद अभय शरण। जनम लइया सुखे, कृष्ण ना बलिनु मुखे ना करिनु से रूप भावन।। राधाकृष्ण दुहुँ पाय, तनु मन रहु ताय, आर दूरे जाउक वासना। नरोत्तमदासे कय, आर मोर नाहि भय, तनु मन सौंपिनु आपना।।२१।।
हरि हरि ! आर कि एमन दशा हव। ए भव संसार त्यजि, परम आनन्दे मजि, आर कबे ब्रजभूमे जाव।। सुखमय वृन्दावन, कबे हवे दरशन, से धूलि लागिबे कबे गाय। प्रेमे गद गद हैञा, राधाकृष्ण नाम लैञा, काँदिया बेड़ाइब उभराय।। निभृते निकुञ्जे जाञा, अष्टांगे प्रणाम हैञा, डाकिब हा राधानाथ बलि। कबे यमुनार तीरे, परश करिब नीरे, कबे पिब करपुटे तुलि।। आर कबे एमन हब, श्री रासमण्डले जाब, कबे गड़ागड़ि दिव ताय। वंशीवट छाया पाञा, परम आनन्द हैञा, पड़िया रहिब तार छाय।। कबे गोवर्द्धन गिरि, देखिब नयन भरि, कबे हबे राधाकुण्डे वास। भ्रमिते भ्रमिते कबे, ए देह पतन हबे, कहे दीन नरोत्तमदास।।२२।।
हरि हरि ! आर कबे पालटिबे दशा। ए सब करिया वामे, जाव वृन्दावन धामे, एइ मने करियाछि आशा।। धन-जन पुत्र-दारे, ए सब करिया दूरे, एकान्त हइया कबे जाव। सब दुःख परिहरि, वृन्दावने वास करि, माधुकरी मागिया खाइव।। यमुनार जल जेन, अमृत समान हेन, कबे पिब उदर पूरिया। कबे राधाकुण्ड जले, स्नान करि कुतूहले, श्यामकुण्डे रहिव पड़िया।। भ्रमिव द्वादश वने, रास केलि जे जे स्थाने, प्रेमावेशे गड़ागड़ि दिया। सुधाइव जने-जने, ब्रजवासिगण स्थाने, निवेदिव चरणे धरिया।। भजनेर स्थान कबे, नयन गोचर हबे, आर जत आछे उपवन। तार मध्ये वृन्दावन, नरोत्तमदासेर मन, आशा करे युगलचरण।।२३।।
करंग कौपीन लञा, छेड़ा काँथा गाय दिया, तेयागिब सकल विषय। कृष्णे अनुराग हबे, ब्रजेर निकुञ्जे कबे, जाइया करिब निजालय।। हरि हरि ! कबे मोर हइबे सुदिन। फलमूल वृन्दावने, खाञा दिवा-अवसाने, भ्रमिव हइया उदासीन।। शीतल यमुना जले, स्थान कर कुतूहले, प्रेमावेशे आनन्दित हञा। बाहुर उपर बाहु तुलि, वृन्दावने कुलि कुलि, कृष्ण बलि बेड़ाब काँदिया।। देखिव संकेत स्थान, जुड़ाबे तापित प्राण, प्रेमावेशे गड़ागड़ि दिव। काँहा राधा ! प्राणेश्वरि ! काँहा गिरिवरधारि, काँहा नाथ ! बलिया डाकिब।। माधवी कुञ्जेरोपरि, सुखे बसि शुक शारी, गाइवेक राधाकृष्ण रस। तरुमूले बसि ताहा शुनि जुड़ाइवे हिया, कबे सुखे गोङाव दिवस।। श्रीगोविन्द गोपीनाथ, श्रीमती राधिका साथ, देखिव रतन सिंहासने। दीन नरोत्तमदास, करिये दुर्लभ आश, एमति हइबे कत दिने।।२४।।
हरि हरि ! कबे हव वृन्दावनवासी। निरखिब नयने युगल रूपराशि।। त्यजिया शयन सुख विचित्र पालंक। कबे ब्रजेर धूलाय धूसर हबे अंग।। षडरस भोजन दूरे परिहार। कबे ब्रजे मागिया खाइब मधुकरी।। परिक्रमा करिया बेड़ाब बने बने। विश्राम करिब जाइ यमुना पुलिने।। ताप दूर करिब शीतल वंशीवटे। (कबे) कुञ्जे बैठब हाम वैष्णव निकटे।। नरोत्तमदास कहे करि परिहार। कबे वा एमन दशा हइबे आमार।।२५।।
आर कि एमन दशा हबे। सब छाड़ि वृन्दावन जाब।। आर कबे श्रीरास मण्डले। गड़ागड़ि दिव कुतूहले।। आर कबे गोवर्द्धन गिरि। देखिव नयन युग भरि।। श्यामकुण्डे राधाकुण्डे स्नान। करि कबे जुड़ाब पराण।। आर कबे यमुनार जले। मज्जने हइब निरमले।। साधुसंगे वृन्दावने वास। नरोत्तमदास करे आश।।२६।।
राधा-कृष्ण सेवों मुञि जीवने मरणे। ताँर स्थान ताँर लीला देखो रात्रि दिने।। जे स्थाने जे लीला करे युगल किशोर। सखीर संगिनी हञा ताहे हङ भोर।। श्रीरूपमञ्जरी पद सेवा निरवधि। ताँर पादपद्म मोर मन्त्र महौषधि।। श्रीरतिमञ्जरी देवि ! मोरे कर दया। अनुक्षण देह तुया पादपद्म छाया।। श्रीरसमञ्जरी देवि ! कर अवधान। अनुक्षण देह तुया पाद पद्म ध्यान।। वृन्दावने नित्य नित्य युगल-विलास। प्रार्थना करये सदा नरोत्तमदास।।२७।।
राधाकृष्ण प्राण मोर युगलकिशोर। जीवने मरणे गति आर नाहि मोर।। कालिन्दीर कूले केलि कदम्बेर वन। रतन वेदीर उपर बसाव दुजन।। श्यामगौरी अंगे दिव (चुया) चन्दनेर गन्ध। चामर दुलाब कबे हेरिव मुखचन्द्र।। गाँथिया मालतीर माला दिव दोंहार गले। अधरे तुलिया दिव कर्पूर ताम्बूले।। ललिता विशाखा आदि जत सखीवृन्द। आज्ञाय करिव सेवा चरणारविन्द।। श्रीकृष्णचैतन्य प्रभुर दासेर अनुदास। सेवा अभिलाष करे नरोत्तमदास।।२८।।
हरि हरि ! कबे मोर हइबे सुदिन। केलि कौतुक रंगे करिब सेवन।। ललिता विशाखा सने, जतेक सखीर गणे। मण्डली करिब दोंहा मेलि। राइकानु करे धरि, नृत्य करे फिरि। निरखि गोङाव कुतूहली।। अलस विश्राम धरे, गोवर्द्धन गिरिवरे। राइ कानु करिबे शयने। नरोत्तमदासे कय, एइ जेन मोर हय। अनुक्षण चरण सेवने।।२९।।
गोवर्द्धन गिरिवर, परम निर्ज्जन स्थल, राइ कानु करिबे शयने। ललिता विशाखा संगे, सेवन करिब रंगे, सुखमय रातुल चरणे।। कनक सम्पुट करि, कर्पूर ताम्बुल पुरि, जोगाइव वदन कमले।। मणिमय किंकिणी, रतननूपुर आनि, पराइव चरण युगले।। कनक कटोरा पुरि, कर्पूर, चन्दन भरि, कबे दिव दु जनार गाय।। मल्लिका मालती यूथी, नाना फुले माला गुथि, कबे दिव दोंहार गलाय।। सुवर्णेर झारि करि, राधाकुण्डे जल पुरि, दोंहाकार अंगेते मखिब। गुरु-रूपा सखी वामे, त्रिभंग भंगिमा ठामे, चामरेर बातास करिब।। दोंहार कमल-आँखि, पुलक हइया देखि, दुँहु पद परशिव कबे। चैतन्यदासेर दास, मने मात्र अभिलाष, नरोत्तमदासे सदा स्फुरे।।३०।।
हरि हरि ! आर कि एमन दशा हव। कबे वृषभानुपुरे, आहीरी गोपेर घरे, तनया हइया जनमिब।। याबटे आमार कबे, ए पाणिग्रहण हबे, बसति करिव कबे ताय। सखीर परम श्रेष्ठ, जे ताहार हय प्रेष्ठ, सेवन करिव तार पाय।। तेंह कृपावान हैया, रातुल चरणे लञा, आमारे करिबे समर्पण। सफल हइबे दशा, पुरिबे मनेर आशा, सेबि दुहार युगलचरण।। वृन्दावने दुइ जन, चतुर्दिके सखीगण, सेवन करिव अवशेषे। सखीगण चारि भिते, नाना यन्त्र लैया हाथे, देखिव मनेर अभिलाषे।। दुँइ चाँदमुख देखि, जुड़ाबे तापित आँखि, नयने बहिबे अश्रुधार। वृन्दार निदेश पाव, दोहार निकटे जाब, हेन दिन हइबे आमार।। श्रीरूपमञ्जरी सखी, मोरे अनाथिनी देखि, राखिबे रातुल दु’टि पाय। नरोत्तमदास भणे, प्रिय नर्म्म सखीगणे, कबे दासी करिबे आमाय।।३१।।
हरि हरि ! आर कि एमन दशा हव। छाड़िया पुरुष देह, कबे प्रकृति हब, दुँहु अंगे चन्दन पराव।। टानिया बाँधिव चूड़ा, नव गुञ्जाहारे बेड़ा, नाना फुले गाँथि दिव हार। पीतवसन अंगे, पराइव सखी संगे, वदने ताम्बुल दिव आर।। दुँहु रूप मनोहारी, हेरव नयन भरि, नीलाम्बरे राइ साजाइया। नवरत्न जड़ि आनि, बाँधिव विचित्र वेणी, ताहे फुलमालती गाँथिया।। से ना रूप माधुरी, देखिव नयन भरि, एइ करि मने अभिलाष। जय रूप सनातन, देह मोरे एइ धन, निवेदय नरोत्तमदास।।३२।।
प्राणेश्वरि ! एइबार करुणा कर मोरे। दशनेते तृण धरि, अञ्जलि मस्तके धरि, एइजन निवेदन करे।। प्रिय सहचरी संगे, सेवन करिब रंगे, अंगे वेश करिबेक साधे। राइ एइ सेवा काजे, निज पद पंकजे, प्रिय सहचरी गण माझे।। सुगन्धि चन्दन, मणिमय आभरण, कौशिक वसन नाना रंगे। एइ सब सेवा जाँर, जेन हङ ताँर, अनुक्षण थाकि ताँर संगे।। जल सुवासित करि, रतन भृंगारे भरि, कर्पूर वासित गुया पान। ए सब साजाइया डाला, लवंग मालती माला, भक्ष्य द्रव्यनाना अनुपाम।। सखीर इंगित हबे, ए सब आनिया कबे, योगाइव ललिता के काछे। नरोत्तमदास कय, एइ जेन मोर हय, दाँड़ाइया रहु सखीर पाछे।।३३।।
प्राणेश्वरि ! कबे मोर हबे कृपादिठि । अरुण कमल दले, शेज बिछाइव, बसावव किशोर किशोरी। अलका आवृतमुख, पंकज मनोहर, मरकत श्याम हेम गोरी।। आज्ञाय आनिया कबे, विविध फूलवर, शुनव वचन दुँहु मिठि। मृगमद तिलक, सिन्दुर बनायव, लेपव चन्दन गन्धे। गाँथि मालती फूल, हार पहिरा-ओव, धाओयाय मधुकर वृन्दे। ललिता कबे मोर, वीजन देओयव, वीजव मारुत मन्दे।। श्रमजल सकल, मिटिव दुँहु कलेवर, हेरव परम आनन्दे। नरोत्तमदास, आश पद पंकज, सेवन माधुरी-पाने। होओयव हेन दिन, ना देखिये कोन चिह्न, दुँहुजन हेरव नयाने।।३४।।
हरि हरि ! मनोरथ फलिबे आमारे। कुसुमित वृन्दावने, नाचत शिखगणे, पिककुल भ्रमर झंकारे। प्रिय सहचरी संगे, गाइया जाइये रंगे, मनोहर निकुञ्ज कुटीरे।। दुँहुक मन्थर गति, कौतुके हेरव अति, अंग भरि पुलक अन्तरे। चौदिके सखीर माझे, राधिकार इंगिते, चिरुणी लइया करे करि।। कुटिल कुन्तल सब, विथरिया आँचरव, बनाइव विचित्र कबरी। मृगमद मलयज, सब अंगे लेपव, पराइव मनोहर हार। चन्दन कुंकुमे, तिलक बनाइव, हेरव मुख सुधाकर।। नीलपट्टाम्बर, जतने पराइव, पाये दिव रतन मञ्जीरे। भृंगारेर जले रांगा, चरण धोयाइव, मुछव आपन चिकुरे।। कुसुम कमल दले, शेज बिछाइव, शयन कराब दोंहाकारे। धवल चामर आनि, मृदु मृदु वीजब, छरमित दुँहुक शरीरे।। कनक सम्पुट करि, कर्पूर ताम्बुल भरि, जोगाइव दोंहार वदने। अधर सुधारसे, ताम्बुल सुबासे, भोखब अधिक जतने।। श्रीगुरुकरुणासिन्धु, लोकनाथ दीनबन्धु, मुइ दिके कर अवधान। राधाकृष्ण वृन्दावन, प्रिय नर्म्म सखीगण, नरोत्तम मागे एइ दान।।३५।।
हरि हरि ! कबे मोर हइबे सुदिन। गोवर्द्धन गिरिवरे, परम निभृत धरे, राइ कानु कराब शयन।। भृंगारेर जले राँगा, चरण धोयाइव, मुछाव आपन चिकुरे। कनक सम्पुट करि, कर्पूर ताम्बुल पुरि, जोगाइव दुहुँक अधरे।। प्रिय सखीगण संगे, सेवन करिब रंगे, चरण सेविब निज करे। दुहुँक कमल दिठि, कौतुके हेरव सुठि, दुँहु अंग पुलक अन्तरे।। मल्लिका मालती यूथी, नाना फूले माला गाँथि, कबे दिब दोंहार गलाय। सोनार कटोरा करि, कर्पूर चन्दन भरि, कबे दिब दोंहाकार गाय।। आर कबे एमन हब, दुँहु मुख निरखिव, लीलारस निकुञ्ज शयने। श्रीकुन्दलतार संगे, केलि कौतुक रंगे, नरोत्तम करिबे श्रवणे।।३६।।
प्रभु हे ! एइबार करह करुणा। जुगल चरण देखि, सफल करिब आँखि, ऐइ मोर मनेर कामना।। निज पद सेवा दिवा, नाहि मोरे उपेखिवा, दुँहु पँहु करुणा सागर। दुँहु बिनु नाहि जानो, एइ बड़ भाग्य मानो, मुइ बड़ पतित पामर।। ललिता आदेश पाञा, चरण सेविब जाञा, प्रिय सखी संगे हय मने। दुँहु दाता शिरोमणि, अति दीन मोरे जानि, निकटे चरण दिबे दाने।। पाब राधाकृष्ण पा, घुचिबे मनेर घा, दूरे जाबे ए सब विकल। नरोत्तमदासे कय, एइ वाँछा सिद्धि हय, देह-प्राण सकल सफल।।३७।।
हरि हरि ! कि मोर करम अनुरत। विषये कुटिल मति, सत्संगे ना हैल रति, कि से आर तरिवार पथ।। स्वरूप सनातन रूप, रघुनाथ भट्टयुग, लोकनाथ सिद्धान्त सागर। शुनिताम से सब कथा, घूचित मनेर व्यथा, तबे भाल हइत अन्तर।। जखन गौर नित्यानन्द, अद्वैतादि भक्तवृन्द, नदीया नगरे अवतार। तखन ना हैल जन्म, एबे देहे किबा कर्म्म, मिछा मात्र बहि फिरि भार।। हरिदास आदि बुले, महोत्सव आदि करे, न हेरिनु से सुख विलास। कि मोर दुःखेर कथा, जनम गोङानु वृथा, धिक्-धिक् नरोत्तमदास।।३८।।
श्रीरूप मञ्जरी पद, सेइ मोर सम्पद, सेइ मोर भजन पूजन। सेइ मोर प्राणधन, सेइ मोर आभरण, सेइ मोर जीवनेर जीवन।। सेइ मोर रसानिधि, सेइ मोर बाँछा सिद्धि, सेइ मोर वेदेर धरम। सेइ व्रत सेइ तप, सेइ मोर मन्त्र जप, सेइ मोर धरम करम।। अनुकूल हबे विधि, से पद हइबे सिद्धि, निरखिव ए दुइ नयाने। से रूप माधुरी राशि, प्राण कुवलय शशि, प्रफुल्लित हबे निशि दिने।। तुया अदर्शन अहि, गरले जारल देही, चिर दिन तापित जीवन। हा हा प्रभु ! कर दया, देह मोरे पद छाया, नरोत्तम लइल शरण।।३९।।
शुनियाछि साधु मुखे बले सर्वजन। श्रीरूप कृपाय मिले युगल चरण।। हा हा प्रभु सनातन गौर परिवार। सबे मिलि वाँछा पूर्ण करह आमार।। श्रीरूपेर कृपा जेन आमा प्रति हय। से पद आश्रय जार सेइ महाशय।। प्रभु लोकनाथ कबे संगे लइया जाबे। श्रीरूपेर पाद पद्मे मोरे समर्पिवे।। हेन कि हइबे मोर नर्म्म सखी गणे। अनुगत नरोत्तमे करिबे शासने।।४०।।
एइ नव दासी बलि श्रीरूप चाँहिबे। हेन शुभ क्षण मोर कत दिने हबे।। शीघ्र आज्ञा करिवेन “दासी एथा आय। सेवार सुसज्जा कार्य करह त्वराय”।। आनन्दित हञा हिया ताँर आज्ञा बले। पवित्र मनेते कार्य करिव तत्काले।। सेवार सामग्री रत्न थालेते करिया। सुवासित वारि स्वर्ण झारिते पुरिया।। दुँहार सम्मुखे लये दिब शीघ्र गति। नरोत्तमेर दशा कबे हइबे एमति।।४१।।
श्रीरूप पश्चाते आमि रहिब भीत हञा। दोंहे पुनः कहिबेन आमा पाने चाञा।। सदय हृदये दोंहे कहिबेन हासि। कोथाय पाइले रूप ! एइ नव दासी।। श्रीरूपमञ्जरी तबे दोंह वाक्य शुनि। मंजुलाली दिल मोरे एइ दासी आनि।। अति नम्रचित्त आमि इहारे जानिल। सेवा कार्य्य दिया तबे हेथाय राखिल।। हेन तत्त्व दोहाकार साक्षाते कहिया। नरोत्तमे सेवाय दिबे नियुक्त करिया।।४२।।
हा हा प्रभु ! लोकनाथ ! राख पाद द्वन्दे। कृपा दृष्टे चाह यदि हइया आनन्दे।। मनोवाँछा सिद्धि तबे हङ पूर्णतृष्ण। हेथाय चैतन्य मिले सेवा राधाकृष्ण।। तुमि ना करिले दया के करिबे आर। मनेर वासना पूर्ण कर एइ बार।। ए तिन संसारे मोर आर केह नाइ। कृपा करि निज पद तले देह ठाञि।। राधाकृष्ण लीला गुण गाङ रात्रि दिने। नरोत्तम वाँछा पूर्ण नहे तुया बिने।।४३।।
लोकनाथ प्रभु ! तुमि दया कर मोरे। राधाकृष्ण चरणे जेन सदा चित्त स्फुरे।। तोमार सहिते थाकि सखीर सहिते। एइ त वासना मोर सदा उठे चिते।। सखीगण ज्येष्ठ जेंहो ताँहार चरणे। मोरे समर्पिबे कबे सेवार कारणे।। तबे से हइबे मोर वाञ्छित पूरण। आनन्दे सेवित दोंहार युगल चरण।। श्रीरूपमञ्जरि सखि ! कृपा दृष्‍टे चाञा। तापि नरोत्तमे सिंच सेवामृत दिञा।।४४।।
हा हा ! कर दया करुणा तोमार। मिछा माया ज्वाले तनु दहिछे आमार।। कबे हेन दशा हबे सखी संग पाब। वृन्दावने फूल गाँथि दोंहाके पराब।। सम्मुखे बसिया कबे चामर ढुलाब। अगुरु चन्दन गन्ध दोंह अंगे दिब।। सखीर आनाय कबे ताम्बुल जोगाब। सिन्दूर तिलक कबे दोंहाके पराब।। विलास कौतुक केलि देखिब नयने। चन्द्रमुख निरखव बसाये सिंहासने।। सदा से माधुरी देखि मनेर लालसे। कत दिने हबे दया नरोत्तमदासे।।४५।।
हरि हरि ! कबे हेन दशा हबे मोर। सेविव दोंहार पद आनन्दे विभोर।। भ्रमर हइया सदा रहिव चरणे। श्रीचरणामृत सदा करिव आस्वादने।। एइ आशा करि आमि जत सखीगण। तोमादेर कृपाय हय वाँछित पूरण।। बहुदिने वाँछा करि पूर्ण जाते हय। सबे मेलि दया कर हइया सदय।। सेवा आशे नरोत्तम काँदे दिवा-निशि। कृपा करि कर मोरे अनुगत दासी।।४६।।
जय जय श्रीकृष्णचैतन्य नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द।। कृपा करि सबे मेलि करह करुणा। अधम पतित जने ना करिह घृणा।। ए तिन संसार माझे तुया पद सार। भाविया देखिनु मने गति नाहि आर।। से पद पाबार आशे खेद उठे मने। व्याकुल हृदय सदा करिये क्रन्दने।। कि रूपे पाइब किछु ना पाइ सन्धान। प्रभु लोकनाथ-पद नाहिक स्मरण।। तुमि त दयाल प्रभु चाह एक बार। नरोत्तम हृदयेर घुचाओ अन्धकार।।४७।।
कबे कृष्णधन पाव, हियार माझारे थोव, जुड़ाइव ए पाप पराण। साजाइया दिव हिया, बसाइव प्राणप्रिया, निरखिव से चन्द्रवदान।। हे सजनि! कबे मोर हइवे सुदिन। से प्राणनाथेर संगे, कबे वा फिरिव रंगे, सुखमय यमुना पुलिन।। ललिता विशाखा निया, ताँहारे बैठिव गिया, साजाइव नाना उपहार। सदय हइया विधि, मिलाइवे गुणनिधि, हेन भाग्य हइवे आमार।। दारुण विधिर नाट, भांगिल प्रेमेर हाट, तिल मात्र ना राखिल तार। कहे नरोत्तमदास, कि मोर जीवने आश, छाड़ि गेल ब्रजेन्द्रकुमार।।४८।।
एइ बार पाइले देखा चरण दुखानि। हियार माझारे राखि जुड़ाव पराणी।। तारे ना देखिया मोर मने बड़ ताप। अनले पशिब किंवा जले दिव झाँप।। मुखेर मुछाव घाम खाओयाव पानगुया। घामेते बातास दिव चन्दनादि चुया।। वृन्दावनेर फुलेर गाँथिया दिव हार। बनाइया बाँधिव चूड़ा कुन्तलेर भार।। कपाले तिलक दिव चन्दनेर चाँद। नरोत्तमदास कहे पिरीतेर फाँद।।४९।।
गोरा पहुँ ना भजिया मैनु। प्रेमरतन धन हेलाय हाराइनु।। अधम यतन करि धन तेयागिनु। आपन करम दोषे आपनि डुबिनु।। सत्संग छाड़ि कैलु असते विलास। ते कारणे लागिल जे कर्म्म बन्ध फाँस।। विषय विषम विष सतत खाइनु। गौर कीर्तन रसे मगन ना हैनु।। केन वा आछये प्राण कि सुख पाइया। नरोत्तमदास केन ना गेल मरिया।।५०।।
वृन्दावन रम्य स्थान, दिव्य चिन्तामणि धाम, रतन मन्दिर मनोहर। आवृत कालिन्दी नीरे, राजहंस केलि करे, ताहे शोभे कनक कमल।। तार मध्ये हेम पीठ, अष्ट दले वेष्टित, अष्टदले प्रधान नायिका। तार मध्ये रत्नासने, वसि आछेन दुइ जने, श्याम संगे सुन्दरी राधिका।। ओ रूप लावण्य राशि, अमिय पड़िछे खसि, हास्य परिहास सम्भाषणे। नरोत्तमदासे कय, नित्यलीला सुखमय, सदाय स्फुरुक मोर मने।।५१।।
कदम्ब तरुर डाल, नामियाछे भूमे भाल, फुटियाछे फुल सारि सारि। परिमले भरल सकल वृन्दावने, केलि करे भ्रमरा भ्रमरी, राइकानु विलासइ रंगे।। किवा रूप लावण़ि, वैदग्ध खनि धनि, मणिमय आभरण अंगे। राधार दक्षिण कर, धरि प्रिय गिरिधर, मधुर मधुर चलि जाय।। आगे पाछे सखीगण, करे फुल वरिषण, कोन सखी चामर ढुलाय। परागे धूसर स्थल, चन्द्र करे सुशीतल, मणिमय वेदीर उपरे।। राइकानु कर जोड़ि, नृत्य करे फिरिफिरि, परशे पुलके तनु भरे। मृगमद चन्दन, करे करि सखीगण, बरिखये फुल गन्धराजे।। श्रम जल बिन्दु, शोभा करे मुख इन्दु, अधरे मुरली नाहि बाजे। हास विलास रस, सरल मधुर भाष, नरोत्तम मनोरथ भरु।। दुँहुक विचित्र वेष, कुसुमे रचित केश, लोचन मोहन लीला करु।।५२।।
आजि रसे बादर निशि। प्रेमे भासि सब वृन्दावनवासी।। श्याम घन बरखिये प्रेम सुधाधार। कोरे रंगिणी राधा विजुरी संचार।। प्रेमे पिछल पथ गमन भेल बंक। मृग मद चन्दन कुंकुमे भेल पंक।। दिग विदिग नाहि-प्रेमेर पाथार। डुबिल नरोत्तम ना जाने साँतार।।५३।।
हे देहे नागर वर, शुन ओहे मुरलीधर, निवेदन करि तुया पाये। चरण नखर मणि, जेन चाँदिर गाँथनि, भाल शोभे आमार गलाय।। श्रीदाम सुदाम संगे, जखन बने जाओ रंगे, तखन आमि दुआरे दाँड़ाये। मने करि संगे जाइ, गुरु जनार भय पाइ, आँखि रहिल तुया पाने चेये।। चाइ नवीन मेघ पाने, तुया बँधु ! पड़े मने, एलाइले केशे नाहि बाँधि। रन्धन शालाते जाइ, तुया बँधु गुण गाइ, धुँयार जलना करि काँदि।। मणि नओ माणिक नओ, आँचले बाँधिले रओ, फुल नओ जे केशे करि वेश। नारी ना करिव विधि, तुया हेन गुणनिधि लइया फिरिताम देशे देशे।। अगुरु चन्दन हइताम, तुया अंगे माखा रइताम, घामिया पड़िताम राँगा पाय। कि मोर मनेर साध, वामन हये चाँदे हात, विधि कि साध पुरावे आमार।। नरोत्तम दासे कय, तोमार उचित हय, तुमि आमाय ना छाड़िह दया। जे दिन तोमार भावे, आमार ए देह जावे, सेइ दिने देओ पद छाया।।५४।।
हरि बलिव आर मदनमोहन हेरिब गो। एइ रूपे ब्रजेर पथे कबे चलिब गो।। जाव जो ब्रजेन्द्रपुर, हब गोपिकार नूपुर, तादेर चरणे मधुर-मधुर बाजिब गो। विपिने विनोद खेला, संगेते राखालेर मेला, ताँदिर चरणेर धूला माखिब गो।। राधाकृष्णेर रूप माधुरी, हेरिब दु नयन भरि, निकुञ्जेर द्वारे द्वारी रहिब गो। तोमरा सब ब्रजवासी, पुराओ मनेर अभिलाषइ, कबे श्रीकृष्णेर बाँशी शुनिव गो।। एइ देह अन्तिम काले, राखिब श्रीयमुनार जले, जय राधा श्रीकृष्ण बोले भासिब गो। कहे नरोत्तमदास, ना पूरिल अभिलाष, कबे हाम ब्रजवास करिब गो।।५५।।

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