Goddess Devi

श्री प्रत्यङ्गिरा दण्डकम्

(Sri Pratyangira Dandakam)

Also known as shri pratyangira dandakam · shree pratyangira dandakam · pratyangira dandakam

A daṇḍaka, which is a metre rather than a genre — very long lines that run on without a break, so the text reads as a single sustained utterance and is meant to be spoken in one unbroken flow. Its opening prayer sets the goddess where this tradition places her: dwelling always in the cremation ground at Karavīra, mounted upon a corpse for the good of those who bow; white as the moon and as snow, five-faced, ten-armed, the primal one; and she is identified there with Siddhilakṣmī. The daṇḍaka itself then addresses her as mother of the world and describes the gods bowing at her feet, so that the pollen of the mandāra garlands on the crowns of Hari, Hara and Brahmā gathers on her lotus feet. It closes by asking her to drive off all the speaker's wrongdoing, and ends on the seed-syllables it opened with.

Read In:

Script: Devanagari (देवनागरी) — also the script of Hindi, Marathi, Nepali and Konkani.

॥ श्री प्रत्यङ्गिरा दण्डकम् ॥
ॐ नमः प्रत्यङ्गिरायै ॥
प्रार्थना
निवसति करवीरे सर्वदा या श्मशाने
विनतजनहिताय प्रेतरूढे महेशि ।
हिमकर हिमशुभ्रां पञ्चवक्त्रां त्वमाद्यां
दिशतु दशभुजाया सा श्रियं सिद्धिलक्ष्मीः ॥
दण्डकम्
ऐं ख्फ्रेम् । जय जय जगदम्ब प्रणत हरिहरहिरण्यगर्भ प्रमुख सुरमुकुट मन्दारमाला परिमलदतिपटल वाचाल चरण पुण्डरीकेषु पुण्डरीकाक्ष प्रमुख कर कम्बु विमल मन्दाकिनी शरदेन्दु कुन्दारविन्दसन्दोह सुन्दरशरीरप्रभे । जय जय महाकालि कालनाशिनि समयचक्रे मेलापकाशिनि सिद्धिगणयोगिनी वीरविद्याधरी जननिकर मुनिकुरुम्बिनी तुम्बिनी कदम्ब किन्नरवाराध्यमाने करालो विधाने सिद्धिलक्ष्मीप्रदे विरूपाक्षचक्षुसंवासे आनन्दरसदायिके त्रिभुवननायिके स्फुरदनर्घमणि मुक्तबलीकलापमध्यस्थिता चक्षुत्रवाभरण झणझणायमान तरुवल्लरीवहल प्रभा पटल पालीकृत सकल दिङ्मण्डल गण्डस्थलोल्लसित रविशशिकुण्डले पीत कठिन कुच कलश युगलान्तनुवालकुलित नर मुण्डावली मण्डिते, चण्डि रुधिरपानप्रमत्ते प्रेतकलोत्ताल वेताल करतालिका ताडन ताण्डव प्रमुखा नट डाकिनी चक्र चङ्क्रमण चकितविताय चमत्कार विस्फुरित पिशाच प्रलय चित्कार ध्वनि मुखरकनवीर श्मशानाधिनिवासिनी रुद्रस्कन्धाधिरुढे, षडाधारमध्यारविन्द मन्दिरोदराङ्कुचोन्नत प्रसूतजगाममनायमानकुल कुण्डलिनी शक्तिप्रभा प्रदीपिका सखमनासवलेरिगमदाकाश शशिमण्डलामृतधारा पयोनिधिगमन मानसैरुदित हसैरखिल साधकैरविभाव्यते मातृकाचक्र सम्भाविते मृगाङ्क कुङ्कुमागुरु मृगमदाङ्गराग परिमलवासितावास मणिमण्डपे खण्डेन्दु मण्डितोरुजटाकलापकलित करवीरोदार करहार कनक केतकी नवमालिका तालिका मदयन्तिका माधवी विविध गन्धबन्धुर गन्धवाह वहदरुणसवनाचले ध्यानाकार चकित त्रिनयनाचले ओं जय जय जगज्जननि जय जय ॥ १ ॥
ख्फ्रें ऐम् । जय जय नवाक्षरी नवत्यधिकशताक्षर मन्त्रमालाधिदैवते कालि कात्यायनि कपालिनि नररुधिरवशापिशित परिपूर्ण कपाल करवाल त्रिशूल खट्वाङ्ग घण्टा मुण्ड पाशाङ्कुश वराऽभय शोभितकरे सुकरे बद्धवीरासने सिद्धेश्वरि सिद्धविद्याधरोरगेन्द्रका ध्यायमानाङ्घ्रि लयेशाम्भवावेश विभवे देवदेवि महादेवि अनाख्ये उमाख्ये सदापूर्णिमारख्ये लसत्तारकाख्ये अकाराक्षरदोस्फुरदम्बराकारे महाव्योम्नि व्योमवामेश्वरी कुण्डिके खेचरी गोचरी दिक्चरि शाम्बरी शक्ति चक्र क्रियेच्छाज्ञानरुप गुणातीत नित्यामृते नित्यभोगप्रदे सन्ध्यावसानसमये लास्यविलासे टटमहानट जटाजूटापगारि रसदलङ्कार सकलकाव्यकलाकलाप वहलधी त्रिगुण प्रबन्ध विविधबन्धु सुन्दर कविता सिद्धिदे ऋद्धिदे बुद्धिदे ज्ञानदे मानदे शारदे षोडशाक्षराधिरूढ सकलसिद्धि चतुर्वर्गफलविधायिनि प्रणतजनहितकारिणि
जय जय जगदम्ब प्रत्यङ्गिरे ख्फ्रें ऐं ओम् ॥ २ ॥
फलश्रुति
मम सकलदुरितानपनुद अपनुद जय जय प्रत्यङ्गिरे जय जय जय हे ऐं ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ख्फ्रें ॐ ॥ ३ ॥
इति श्री प्रत्यङ्गिरा दण्डकम् सम्पूर्णम् ॥

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