करो कृपा माँ शारदा, जीव रहें मेरे साथ॥
अज्ञानी मति मंद मैं, हैं गुरुस्वामी सुजान।
दोषों से मैं भरा हुआ, तुम हो कृपा निधान॥
सुर नर मुनिजन के उद्धारी॥
वाचस्पति सुर गुरु पुरोहित।
कमलासन बृहस्पति विराजित॥
पात्र माल शोभित भुज चारी॥
है स्वर्णिम आवास तुम्हारा।
पीत वदन देवों में न्यारा॥
पाण्डुर वर्ण अश्व चले जुतकर॥
स्वर्ण मुकुट पीताम्बर धारी।
अंगिरा नन्दन गगन विहारी॥
अनन्त वरिष्ठ सर्वज्ञ नामी॥
श्रीमत् धर्म रूप धन दाता।
शरणागत सर्वापद् त्राता॥
गुण बरने सुर गण मुनि नारद॥
कठिन तप प्रभास में कीन्हा।
शंकर प्रसन्न हो वर दीन्हा॥
निर्मल मति वाचस्पति पाओ॥
असुर बने सुर यज्ञ विनाशक।
करें सुरक्षित मन्त्र से सुर मख॥
दैत्य विनाशे विघ्न निवारी॥
बृहस्पति धनु मीन के नायक।
लोक द्विज नय बुद्धि प्रदायक॥
आश्रय दें सर्व पाप निवारें॥
पीताम्बर हल्दी पीला अन्न।
शक्कर मधु पुखराज भू-लवण॥
दे देवें जीव अनेक सुखद वर॥
विद्या सिन्धु स्वयं कहलाते।
भक्तों को सन्मार्ग चलाते॥
विश्वरूपा गुरु किये धारण॥
बढ़ा कष्ट सब राज गँवाया।
दानव ध्वज स्वर्ग लहराया॥
विपदा सकल जीव हर लीन्ही॥
बढ़ा देवों में मान तुम्हारा।
कीरति गावें सकल संसारा॥
उर आनन्द प्रभु भर दीजै॥
सद्गुरु तेरी प्रबल माया।
तेरा पारा ना कोई पाया॥
समझे विरला बहु सुख पाये॥
अमृत वारिद सदृश वाणी।
हिरदय धार भये ब्रह्मज्ञानी॥
देवें भक्ति जीव मनचाही॥
जो अनाथ ना कोइ सहाई।
लख चौरासी पार कराहीं॥
गुरु चरणामृत रुच-रुच पीजे॥
मृग तृष्णा गुरु दर्शन राखी।
मिले मुक्ति हो सब जग साखी॥
पा गये दास पदारथ सारे॥
जग के कार विहारण दोड़े।
गुरु मोह के बन्धन तोड़े॥
गुरुवर सम्मुख व्यर्थ कल्पना॥
कर निष्काम भक्ति गुरुवर की।
सुन्दर छवि धारे सुखकर की॥
मन क्रम वचन ध्यान से ध्यावें॥
काल रूप यम नहीं सतावें।
निश्चय गुरुवर पिंड छुड़ावें॥
रोगी रोग मुक्त हो जावें॥
संतति हीन संस्तुति गावें।
मंगल होय पुत्र-धन पावें॥
स्नेह जीव चरणों में लावे॥
जीव चालीसा पढ़े पढ़ावे।
पूर्ण शांति को पल में पावें॥
किरपा सब पर कीजिये, जान जगत में दीन॥
बृहस्पति चालीसा जो पढ़े, भक्ति भाव मन लाय।
ज्ञान धर्म धन यश मिले, सब दुःख दूर हो जाय॥
