Lord Brihaspati

बृहस्पति चालीसा

(Brihaspati Chalisa)

Also known as gau nita mamgalacarana ganapati mere natha

A Hindi chalisa to Brihaspati which is more precise about him than most chalisas are about anyone. The opening verses fit him out completely — a golden staff and the gesture of blessing, a bowl and a rosary in four hands, a golden house, a golden chariot drawn by pale horses, a gold crown and yellow cloth, Angiras for a father. The middle gives the episodes he is actually known for: the hard austerity performed at Prabhasa and Shankara's boon that made him teacher of the gods and lord of a planet; his guarding of the gods' sacrifices with mantras when the demons came to destroy them; and Indra's causeless insult to him, after which he withdrew, Vishvarupa was made teacher in his place, and heaven passed to the demons until Indra begged pardon. It ends with the Thursday gifts, listed by name.

Read In:

Script: Devanagari (देवनागरी) — also the script of Hindi, Marathi, Nepali and Konkani.

॥ दोहा ॥
गाऊँ नित मंगलाचरण, गणपति मेरे नाथ।
करो कृपा माँ शारदा, जीव रहें मेरे साथ॥
अज्ञानी मति मंद मैं, हैं गुरुस्वामी सुजान।
दोषों से मैं भरा हुआ, तुम हो कृपा निधान॥
॥ चौपाई ॥
वीर देव भक्तन हितकारी।
सुर नर मुनिजन के उद्धारी॥
वाचस्पति सुर गुरु पुरोहित।
कमलासन बृहस्पति विराजित॥
स्वर्ण दंड वर मुद्रा धारी।
पात्र माल शोभित भुज चारी॥
है स्वर्णिम आवास तुम्हारा।
पीत वदन देवों में न्यारा॥
स्वर्णारथ प्रभु अति ही सुखकर।
पाण्डुर वर्ण अश्व चले जुतकर॥
स्वर्ण मुकुट पीताम्बर धारी।
अंगिरा नन्दन गगन विहारी॥
अज अगम्य अविनाशी स्वामी।
अनन्त वरिष्ठ सर्वज्ञ नामी॥
श्रीमत् धर्म रूप धन दाता।
शरणागत सर्वापद् त्राता॥
पुष्य नाथ ब्रह्म विद्या विशारद।
गुण बरने सुर गण मुनि नारद॥
कठिन तप प्रभास में कीन्हा।
शंकर प्रसन्न हो वर दीन्हा॥
देव गुरु ग्रह पति कहाओ।
निर्मल मति वाचस्पति पाओ॥
असुर बने सुर यज्ञ विनाशक।
करें सुरक्षित मन्त्र से सुर मख॥
बनकर देवों के उपकारी।
दैत्य विनाशे विघ्न निवारी॥
बृहस्पति धनु मीन के नायक।
लोक द्विज नय बुद्धि प्रदायक॥
मावस वीर वार व्रत धारे।
आश्रय दें सर्व पाप निवारें॥
पीताम्बर हल्दी पीला अन्न।
शक्कर मधु पुखराज भू-लवण॥
पुस्तक स्वर्ण अश्व दान कर।
दे देवें जीव अनेक सुखद वर॥
विद्या सिन्धु स्वयं कहलाते।
भक्तों को सन्मार्ग चलाते॥
इन्द्र किया अपमान अकारण।
विश्वरूपा गुरु किये धारण॥
बढ़ा कष्ट सब राज गँवाया।
दानव ध्वज स्वर्ग लहराया॥
क्षमा माँग फिर स्तुति कीन्ही।
विपदा सकल जीव हर लीन्ही॥
बढ़ा देवों में मान तुम्हारा।
कीरति गावें सकल संसारा॥
दोष बिसार शरण में लीजै।
उर आनन्द प्रभु भर दीजै॥
सद्गुरु तेरी प्रबल माया।
तेरा पारा ना कोई पाया॥
सब तीर्थ गुरु चरण समाये।
समझे विरला बहु सुख पाये॥
अमृत वारिद सदृश वाणी।
हिरदय धार भये ब्रह्मज्ञानी॥
शोभा मुख से बरनि न जाई।
देवें भक्ति जीव मनचाही॥
जो अनाथ ना कोइ सहाई।
लख चौरासी पार कराहीं॥
प्रथम गुरु का पूजन कीजे।
गुरु चरणामृत रुच-रुच पीजे॥
मृग तृष्णा गुरु दर्शन राखी।
मिले मुक्ति हो सब जग साखी॥
चरणन रज सद्गुरु सिर धारे।
पा गये दास पदारथ सारे॥
जग के कार विहारण दोड़े।
गुरु मोह के बन्धन तोड़े॥
पारस माणिक नीलम रत्ना।
गुरुवर सम्मुख व्यर्थ कल्पना॥
कर निष्काम भक्ति गुरुवर की।
सुन्दर छवि धारे सुखकर की॥
गुरु पताका जो फहराएँ।
मन क्रम वचन ध्यान से ध्यावें॥
काल रूप यम नहीं सतावें।
निश्चय गुरुवर पिंड छुड़ावें॥
भूत पिशाच निकट ना आवें।
रोगी रोग मुक्त हो जावें॥
संतति हीन संस्तुति गावें।
मंगल होय पुत्र-धन पावें॥
जो नर गुण गा हिरदय हर्षावे।
स्नेह जीव चरणों में लावे॥
जीव चालीसा पढ़े पढ़ावे।
पूर्ण शांति को पल में पावें॥
॥ दोहा ॥
मात पिता के संग मनु, गुरु चरण में लीन।
किरपा सब पर कीजिये, जान जगत में दीन॥
बृहस्पति चालीसा जो पढ़े, भक्ति भाव मन लाय।
ज्ञान धर्म धन यश मिले, सब दुःख दूर हो जाय॥

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