Goddess Chamunda

चामुण्डा चालीसा

(Chamunda Chalisa)

Also known as nilavarna ma kalika rahati sada pracamda

A Hindi chalisa which is really the Devi Mahatmya retold in chaupais, and it takes its time. Shumbha and Nishumbha have emptied the three worlds; Vayu and Agni and Yama and Kubera, the sun and moon and Varuna, are all in difficulty and come humiliated to the Himalaya. Kali comes out in anger. The messenger Sugriva is killed first, then Chanda comes and runs; then he returns with armies past counting, and Chanda and Munda come drunk and roaring with a fourfold army. The verse everything turns on is the naming: she takes their two heads in her hand and smiles, and it is Sarasvati who calls out to her, and from that moment the name Chamunda is hers. Its opening dohas describe her before any of this — blue, ten-armed, forever fierce — and its later verses go on to Kalakeya and the rest.

Read In:

Script: Devanagari (देवनागरी) — also the script of Hindi, Marathi, Nepali and Konkani.

॥ दोहा ॥
नीलवर्ण माँ कालिका रहती सदा प्रचंड।
दस हाथों में शस्त्र धार देती दुष्ट को दंड॥
मधु केटभ संहार कर करी धर्म की जीत।
मेरी भी पीड़ा हरो हो जो कर्म पुनीत॥
॥ चौपाई ॥
नमस्कार चामुंडा माता।
तीनो लोक में विख्याता॥
हिमालय में पवित्र धाम है।
महाशक्ति तुमको प्रणाम है॥
मार्कण्डेय ऋषि ने ध्याया।
कैसे प्रगटी भेद बताया॥
शुम्भ निशुम्भ दो दैत्य बलशाली।
तीनो लोक जो कर दिए खाली॥
वायु अग्नि यम कुबेर संग।
सूर्य चंद्र वरुण हुए तंग॥
अपमानित चरणों में आए।
गिरिराज हिमालय को लाए॥
भद्रा-रौद्रा नित्या ध्याया।
चेतन शक्ति करके बुलाया॥
क्रोधित होकर काली आई।
जिसने अपनी लीला दिखाई॥
चण्ड मुण्ड और शुम्भ पठाए।
कामुक वैरी लड़ने आए॥
पहले सुग्रीव दूत को मारा।
भागा चण्ड भी मारा मारा॥
अरबों सैनिक लेकर आया।
दर्पोन्मत्त क्रोध दिखाया॥
जैसे ही दुष्ट ललकारा।
हुंकार शब्द गूँजा के मारा॥
सेना ने मचाई भगदड़।
गर्जना सुनकर आया जो बाद॥
काटने को चण्ड-मुण्ड आए।
मदिरा पीकर घुर्राए॥
चतुरंगी सेना संग लाए।
ऊँचे ऊँचे शिखर गिराए॥
तुमने क्रोधित रूप निकाला।
प्रकटी डाल गले मुंड माला॥
चर्म की साड़ी चीते वाली।
हड्डी ढाँचा था बलशाली॥
विकराल मुखी आँखें दिखलाई।
जिसे देख सृष्टि घबराई॥
चण्ड मुण्ड ने चक्र चलाया।
ले तलवार हुंकार गुंजाया॥
पापियों का कर दिया निस्तार।
चण्ड मुण्ड दोनों को मारा॥
हाथ में मस्तक ले मुस्काई।
पापी सेना फिर घबराई॥
सरस्वती माँ तुम्हें पुकारा।
पड़ा चामुण्डा नाम तिहारा॥
चण्ड मुण्ड की मृत्यु सुनकर।
कालकेय मौर्य आए रात पर॥
अरब खरब युद्ध के पथ पर।
झोंक दिए सब चामुण्डा पर॥
उग्र चंडिका प्रकटी आकर।
गीदड़ों की घाटी भरकर॥
काली खट्वांग घूँसों से मारा।
ब्रह्माणी ने फेंकी जल धारा॥
माहेश्वरी ने त्रिशूल चलाया।
माँ वैष्णवी ने चक्र घुमाया॥
कार्तिकेय की शक्ति आई।
नारसिंही दैत्यों पे छाई॥
चुन चुन सिंह सभी को खाया।
हर दानव घायल घबराया॥
रक्तबीज माया फैलाई।
शक्ति उसने नई दिखाई॥
रक्त गिरा जब धरती ऊपर।
नया दैत्य प्रकटा था वही पर॥
चण्डी माँ अब शूल घुमाया।
मारा उसको लहू चुसाया॥
शुम्भ निशुम्भ अब दौड़े आए।
सत्तर सेना भरकर लाए॥
वज्रपात संग शूल चलाया।
सभी देवता कुछ घबराए॥
ललकारा फिर घूँसा मारा।
ले त्रिशूल किया निस्तार॥
शुम्भ निशुम्भ धरती पर सोए।
दैत्य सभी देखकर रोए॥
चामुण्डा माँ धूम मचाई।
अपना शुभ मंदिर बनवाई॥
सभी देवता आके मानते।
हनुमत भैरव चँवर डुलाते॥
आश्विन चैत नवरात्र आओ।
ध्वजा नारियल भेंट चढ़ाओ॥
बाँड़र नदी स्नान कराओ।
चामुण्डा माँ तुमको पाओ॥
॥ दोहा ॥
शरणागत को शक्ति दो हे जग की आधार।
'ॐ' ये नैया डोलती कर दो भाव से पार॥

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