करहू कृपा निज दास पर, रहहू सदा अनूकूल॥
जय जननी जगदीश्वरी, कह कर बारम्बार।
जगदम्बा करणी सुयश, वरणउ मति अनुसार॥
महिमा अकथन जाय बखानी॥
नमो नमो मेहाई करणी।
नमो नमो अम्बे दुःख हरणी॥
दुःख को हरणि सुख कि दाता॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूं लोक फैलि उजियारो॥
मन वांछित सोई फल पावे॥
धौलागढ़ में आप विराजो।
सिंह सवारी सन्मुख साजो॥
मारे असुर सकल अभिमानी॥
ग्राम सुआप नाम सुखकारी।
चारण वंश करणी अवतारी॥
जाकी महिमा कही न जाई॥
जब भक्तों ने सुमिरण कीन्हा।
ताही समय अभय करि दीन्हा॥
डूबत जल में नाव बचाई॥
जब कान्हे न कुमति बिचारी।
केहरि रूप धरयो महतारी॥
जाकी कथा जगत में छाई॥
नेड़ी जी शुभ धाम तुम्हारो।
दर्शन करि मन होय सुखारो॥
गल राजे पुष्प की माला॥
शेखोजी पर किरपा कीन्ही।
क्षुधा मिटाय अभय कर दीन्हा॥
कारज सबि सुलभ कर दीन्हा॥
देशनोक पावन थल भारी।
सुन्दर मंदिर की छवि न्यारी॥
निखरत ही त्रय ताप नशाती॥
कीन्ही यहाँ तपस्या आकर।
नाम उजागर सब सुख सागर॥
भव सागर से पार करइया॥
बार बार ध्याऊं जगदम्बा।
कीजे दया करो न विलम्बा॥
निज सुत को जीवित करि लीन्हा॥
ताहि समय मर्याद बनाई।
तुम पह मम वंशज नहि आई॥
मूषक ते पुनि मानुष तन धरि है॥
दिपोजी को दर्शन दीन्हा।
निज लिला से अवगत कीन्हा॥
दो नैनन की ज्योति दीन्ही॥
चरित अमित अति कीन्ह अपारा।
जाको यश छायो संसारा॥
मगन भक्त जन करत आरती॥
भीड़ पड़ी भक्तों पर जब ही।
भई सहाय भवानी तब ही॥
सब अपराध क्षमा कर दीजे॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो॥
ताकर सब विधि हो कल्याण॥
निशि वासर पूजहिं नर-नारी।
तिनको सदा करहूं रखवारी॥
पार करहु करणी महतारी॥
कंह लगी वर्णऊ कथा तिहारी।
लिखत लेखनी थकत हमारी॥
सुख सम्पत्ति नव निधि कर दीजै॥
जो यह पाठ करे हमेशा।
ताके तन नहि रहे कलेशा॥
उनके ताप मात सब हरई॥
गुण गाथा गाऊं कर जोरे।
हरह मात सब संकट मोरे॥
मन मंदिर में बास करो मैया, दूर करो अज्ञान॥
