वरणो माता जीण यश, चरणों शीश नवाय॥
झाँकी की अदभुद छवि, शोभा वर्णी न जाय।
जो नित सुमरे माय को, कष्ट दुर हो जाय॥
नमो नमो भक्तन हितकारी॥
सकल कष्ट तु मेट हमारा॥
महिषासुर सा दुष्ट संहारा॥
देखत रूप चराचर मोहे॥
भक्तों के सब कारज किन्हां॥
डरपत भूत प्रेत जम काला॥
ऋषि मुनि कोई पार न पावे॥
रमा लक्ष्मी तुम कपाली॥
मैया मात तू महाभवानी॥
त्यागा सब से क्षण में नेहा॥
हरष खास था भाई ज्ञानी॥
घर वापिस चल माँ की जाई॥
तब हरसा यूँ उचरी बानी॥
तेरे साथ राम गुण गाऊँ॥
रैन दिवस तप मैं चितदीन्हा॥
हरषनाथ भैरू बन छाया॥
महातेज बिजली सा दमके॥
भागे दुष्ट जब दुर्गा जागे॥
सेना बहुत सजाकर लाया॥
फिर वो इस मंदिर पर धाया॥
करी स्तुति मात जगाये॥
सेना सहित भागे घोड़े॥
जा चरणों में शीश नवाया॥
काट जीण मेरी सब बेमारी॥
तेल सवामन और बंधाया॥
तीन लोक में महिमा छाई॥
सच्चे मन से भोग लगावे॥
मनवांछित पूर्ण फल पावे॥
सो नर शोभा जग में पावे॥
सुन्दर शोभा नहीं सुम्हारा॥
कई यात्री आवे जाही॥
चैत मास में लागे मेला॥
भीड़ लगे मेला में भारी॥
कई मर्द और कई जनाना॥
सवामणी का पाऊ न पारा॥
जय जगदम्बा जय महाकाली॥
मौज करे जुग-जुग सुख पावे॥
भक्ति शक्ति दो हे दाता॥
सो सत पाठ करे करवावे॥
सेवक चरणों में चित् लावे॥
दया करो हे चंडिका विनऊ शीश नवाय॥
