तीन लोक चौदह भुवन, करनी का विस्तार ॥
शिल्पन के सरताज, आदि शिल्प के गुरु तुम ॥
विश्वकर्मा महाराज हमारे ॥
देव दनुज सबके दुख टारे ।
दीनन के तुम हो रखवारे ॥
चान्द सूर्य नित करहिं प्रकाशा ॥
नाथ तुम्हारी अद्भुत करनी ।
महिमा अमित जाहि नहिं बरनी ॥
बार बार है तुम्हें नमामी ॥
भव निधि पड़े बहुत दुख पाये ।
सब तजि शरन तुम्हारी आये ॥
बन्धे कीट मर्कट की नाईम् ॥
बन्धन छोर हमें अपनाओ ।
निज चरणों का दास बनाओ ॥
मम उर बसहु नाथ विज्ञानी ॥
सुमिरन भजन तुम्हारा भावै ।
बुरे कर्म से मन हट जावै ॥
भक्त जनन के प्राण पियारे ॥
स्वारथ वश तब भक्ति बिसारी ।
नाथ पड़ा हूं शरण तुम्हारी ॥
जन्म जन्म के दुःख बिनसावै ॥
पुरवहु नाथ मनोरथ मोरा ।
मन क्रम वचन दास मैं तोरा ॥
केवल भक्ती चहौं तिहारी ॥
मङ्गल करन अमङ्गल हारी ।
त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी ॥
शरण शरण मैं शरण तिहारी ॥
तुम सबके गुरु सबके स्वामी ।
तुम सबहीं के अन्तरवामी ॥
तुमहिं भजै सो उतरहिं पारा ॥
घट घट माहिं तुम्हारो बासा ।
सर्व ठौर जिमि दीप प्रकाशा ॥
भक्त अरु जानी कहिए सोई ॥
जगत पिता तुमहीं हो ईशा ।
याते हम विनवत जगदीशा ॥
भक्ति आपनी हमको दीजै ॥
प्रेम भक्ति बिनु कृपा न होई ।
सर्व शास्त्र में देखै जोई ॥
ज्यों सेदै त्यों ही गति होई ॥
जो हरि ज्योति आप प्रगटाई ।
घर घर में सोई दरशाई ॥
को लखि सके चरित्र तुम्हारे ॥
तुम सबके प्रभु अन्तरयामी ।
जीव बिसर रहे तुमको स्वामी ॥
होय मुक्ति जीवन फल पावै ॥
डूब न जावे नाव हमारी ।
हम आये हैं शरण तुम्हारी ॥
भव सागर से करौ किनारे ॥
सुत पितु मातु न कोई सङ्घाती ।
सब तजि भजन करहुं दिन राती ॥
शरण पड़ा हूं नाथ तुम्हारी ॥
विश्वकर्मा ही ब्रह्म कहावै ।
विश्वकर्मा सब सृष्टि रचावै ॥
सुफल काज हों बीसों बीसा ॥
चालिस दिन जो ध्यान लगावै ।
राजद्रोह से मुक्ति पावै ॥
चालीसा में जो मन लावै ॥
धूप देय अरु जपै हमेशा ।
फिर नहिं पावै दुःख लवलेशा ॥
होय मुक्त जग फिर नहिं आवै ॥
उसके जीवन का रखवारा ।
रहे नित्य विश्वकर्मा प्यारा ॥
बसै ह्रदय विश्वकर्मा जाके ॥
नाथ तुम्हारी कृपा बिन, केहि विधि उतरूं पार ॥
हाथ जोड़ विनती करूं, धरुं चरण माथ ।
पूर्ण होय मम कामना, यह वर दीजै कर्तार ॥
