Lord Vishvakarma

श्री विश्वकर्मा चालीसा

(Vishwakarma Chalisa)

Also known as vishwakarma chalisa pdf · manu maya tvasta visvakarma silpa karma

A Hindi chalisa to Vishvakarma which opens on a technical claim rather than a devotional one. Its first doha identifies him with Tvashtr, the Vedic artificer, and calls him the ground of the work of craft; and its sorattha piles up Vedic epithets, the ancient fair-winged one, Sanaga and Sanatana and Ahibhu, and then the plainest of all, the first teacher of craft. That vocabulary places him in the ritual texts rather than in the Puranas. The chalisa is kept by the artisan communities that take him as ancestor, and its day is the one when tools and machines are worshipped instead of used, so its requests are made on behalf of the work of hands. It calls him teacher of the world and the removal of the sorrow of gods and demons alike.

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Script: Devanagari (देवनागरी) — also the script of Hindi, Marathi, Nepali and Konkani.

॥ दोहा ॥
मनु मय त्वष्टा विश्वकर्मा, शिल्प कर्म आधार ।
तीन लोक चौदह भुवन, करनी का विस्तार ॥
॥ सोरठा ॥
प्रत्न सुपर्ण महाराज, सनग सनातन अहिभून ।
शिल्पन के सरताज, आदि शिल्प के गुरु तुम ॥
॥ चौपाई ॥
जगत गुरु जग ईश पियारे ।
विश्वकर्मा महाराज हमारे ॥
देव दनुज सबके दुख टारे ।
दीनन के तुम हो रखवारे ॥
जल, थल, पर्वत और अकाशा ।
चान्द सूर्य नित करहिं प्रकाशा ॥
नाथ तुम्हारी अद्भुत करनी ।
महिमा अमित जाहि नहिं बरनी ॥
सृष्टि आदि कर्ता हो स्वामी ।
बार बार है तुम्हें नमामी ॥
भव निधि पड़े बहुत दुख पाये ।
सब तजि शरन तुम्हारी आये ॥
जप तप भजन न होय गोसाईम् ।
बन्धे कीट मर्कट की नाईम् ॥
बन्धन छोर हमें अपनाओ ।
निज चरणों का दास बनाओ ॥
जयति जयति विश्वकर्मा स्वामी ।
मम उर बसहु नाथ विज्ञानी ॥
सुमिरन भजन तुम्हारा भावै ।
बुरे कर्म से मन हट जावै ॥
साधु सन्त के तुम रखवारे ।
भक्त जनन के प्राण पियारे ॥
स्वारथ वश तब भक्ति बिसारी ।
नाथ पड़ा हूं शरण तुम्हारी ॥
तुमहिं भजै अक्षय सुख पावै ।
जन्म जन्म के दुःख बिनसावै ॥
पुरवहु नाथ मनोरथ मोरा ।
मन क्रम वचन दास मैं तोरा ॥
एक लालसा यही हमारी ।
केवल भक्ती चहौं तिहारी ॥
मङ्गल करन अमङ्गल हारी ।
त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी ॥
आरत-हरण भक्त भय हारी ।
शरण शरण मैं शरण तिहारी ॥
तुम सबके गुरु सबके स्वामी ।
तुम सबहीं के अन्तरवामी ॥
सर्व शक्ति तुम सब आधारा ।
तुमहिं भजै सो उतरहिं पारा ॥
घट घट माहिं तुम्हारो बासा ।
सर्व ठौर जिमि दीप प्रकाशा ॥
यह विधि तुमको जानै कोई ।
भक्त अरु जानी कहिए सोई ॥
जगत पिता तुमहीं हो ईशा ।
याते हम विनवत जगदीशा ॥
नाथ कृपा अब हम पर कीजै ।
भक्ति आपनी हमको दीजै ॥
प्रेम भक्ति बिनु कृपा न होई ।
सर्व शास्त्र में देखै जोई ॥
कर्म योग कर सेवत कोई ।
ज्यों सेदै त्यों ही गति होई ॥
जो हरि ज्योति आप प्रगटाई ।
घर घर में सोई दरशाई ॥
तुम सब ठौर सबन ते न्यारे ।
को लखि सके चरित्र तुम्हारे ॥
तुम सबके प्रभु अन्तरयामी ।
जीव बिसर रहे तुमको स्वामी ॥
विश्वकर्मा को जो कोई ध्यावै ।
होय मुक्ति जीवन फल पावै ॥
डूब न जावे नाव हमारी ।
हम आये हैं शरण तुम्हारी ॥
हम सेवक हैं नाथ तुम्हारे ।
भव सागर से करौ किनारे ॥
सुत पितु मातु न कोई सङ्घाती ।
सब तजि भजन करहुं दिन राती ॥
दीनबन्धु दीनन हितकारी ।
शरण पड़ा हूं नाथ तुम्हारी ॥
विश्वकर्मा ही ब्रह्म कहावै ।
विश्वकर्मा सब सृष्टि रचावै ॥
पढ़ै जो विश्वकर्मा चालीसा ।
सुफल काज हों बीसों बीसा ॥
चालिस दिन जो ध्यान लगावै ।
राजद्रोह से मुक्ति पावै ॥
भूत प्रेत नहिं उनहिं सतावै ।
चालीसा में जो मन लावै ॥
धूप देय अरु जपै हमेशा ।
फिर नहिं पावै दुःख लवलेशा ॥
जो कोई अक्षत पुष्प चढ़ावे ।
होय मुक्त जग फिर नहिं आवै ॥
उसके जीवन का रखवारा ।
रहे नित्य विश्वकर्मा प्यारा ॥
सकल पदारथ करतल ताके ।
बसै ह्रदय विश्वकर्मा जाके ॥
॥ दोहा ॥
आदि सृष्टि आधार तुम, रचना विविध प्रकार ।
नाथ तुम्हारी कृपा बिन, केहि विधि उतरूं पार ॥
हाथ जोड़ विनती करूं, धरुं चरण माथ ।
पूर्ण होय मम कामना, यह वर दीजै कर्तार ॥

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